प्रतिरोध के दमन में पिछले एक साल में इस सरकार ने कीर्तिमान कायम किए हैं. विरोध के अधिकार का दमन इतनी निर्ममता से हाल में हुआ है कि प्रतिरोध की आवाज उससे कमतर रखने का कोई औचित्य नहीं है.
Friday, December 30, 2011
क्या हत्यारे तय करेंगे कि चश्मदीद कितना बोलेगा
Sunday, October 11, 2009
ओबामा शांतिदूत, क्यों मनमोहन में कांटे लगे थे
12 दिन के लिए नोबेल. ये नोबेल का अपमान है या पतन, ये कहे बिना मैं इतना कहना चाहूंगा कि अगर ईरान के खिलाफ आग न उगलने या चीन के डर से नोबेल शांति पुरस्कार के ही दूसरे विजेता दलाई लामा तक से मिलने से मुंह चुराने वाले को इस लायक समझा गया है तो यह रॉयल फाउंडेशन की गंभीरता पर चोट है.
अगर विश्व शांति के लिए इस साल किसी को नोबेल देना ही था तो अपने मनमोहन सिंह से बेहतर भला और कौन है. और कुछ नहीं तो कम से कम मुंबई हमले के बाद कुछ राजनीतिक दलों और कई समाचार संगठनों के संगठित हल्ला-बोल के बावजूद पाकिस्तान पर हमला न करना क्या विश्व शांति में कोई छोटा योगदान है.
पाकिस्तान पर भारत हमला करता तो कुछ और पड़ोसी मित्र का चोला उतारकर मैदान में देर-सबेर नहीं आ जाते, इसकी कोई गारंटी तो थी नहीं. मनमोहन सिंह ने इतनी दूरदर्शिता का परिचय दिया और पड़ोस में पड़े एक महाशक्ति को भारत पर हमला करने का कोई मौका नहीं दिया, ये क्या वैश्विक शांति में छोटा योगदान है.
आज भास्कर में गिरीश निकम जी ने लिखा है कि उनके पास भी विश्व शांति के लिए गजब का विजन है. उन्हें क्यों नहीं दिया जा रहा है नोबेल. ओबामा को भी तो विश्व को परमाणु हथियारों से मुक्ति दिलाने के विजन के लिए ही पुरस्कार दिया जा रहा है. और तो और, ओबामा ने क्या कहा, वो इस दिशा में लगातार काम करेंगे लेकिन उन्हें नहीं लगता कि उनके राष्ट्रपति रहते, यहां तक कि उनके जिंदा रहते, ऐसा हो पाएगा.
अब ऐसे नोबेल पुरस्कार पाने वाले को चूमने और बधाई देने के अलावा और क्या किया जा सकता है.
Saturday, September 19, 2009
नीतीश के लिए साधु-सुभाष साबित होंगे ललन सिंह
Saturday, August 15, 2009
कितना बड़ा चमचा हूं मैं
Monday, June 9, 2008
सोनिया की गैस खत्म, राहुल ने व्रत रखा...
चूंकि यह सपना है इसलिए इसके चरित्र और पात्र काल्पनिक हैं. लेकिन संयोग या कुयोग से अगर इन नामों से मिलते-जुलते लोग आपकी नजर में आएं तो उसे महासंयोग से अधिक न माना जाए।
कल रात मैं नींद पूरी नहीं कर सका. सपने में सोनिया आ गई थीं. और, सपना भी ऐसा डरावना कि पूछो मत...
सोनिया अम्मा राहुल भैया से पूछ रही थीं कि तुम्हारे पास कुछ पैसा है. राहुल ने पूछा क्यों, बोलीं गैस खत्म हो गई है. राहुल बोले, नहीं पैसा तो नहीं है. सोनिया ने फिर पूछा, इस महीने जो वेतन मिला था, क्या हुआ. राहुल बोले, दोस्तों के साथ उड़ीसा के दलित इलाके में पिकनिक मनाने गया था. काफिले में गाड़ियां ज्यादा थी, कई टीवी वाले भी थे, सबकी टंकी फुल करानी पड़ी. रेस्तरां में खाने-पीने का खर्च बढ़ गया. राहुल बोले, मनमोहन या मुरली को कहते हैं, गैस सिलेंडर भिजवा देंगे. सोनिया बोलीं, नहीं. लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे. राहुल बोले, देश में लोग ऐसे ही चल रहे हैं, कोई कुछ नहीं बोलेगा. इस तरह की उधारी तो आम आदमी के लिए आम बात है. वाद-विवाद के बाद तय हुआ कि प्रियंका दीदी की ससुराल से ही गैस सिलेंडर मंगवा ली जाए. दीदी व्यापारी परिवार में गई हैं सो वहां कोई दिक्कत-सिक्कत है नहीं।
राहुल भैया ने प्रियंका दीदी के घर फोन लगाया. पता चला कि फोन की लाइन कट गई है. जेब में पैसे थे नहीं तो राहुल भैया खुद साइकिल लेकर निकले प्रियंका दीदी के घर. वहां पहुंचकर पूछे कि फोन को क्या हो गया. दीदी ने बताया कि बीएसएनएल वालों का चार्ज महंगा है और बिल बहुत आ गया था तो हमने कटवा लिया. अब मोबाइल ले लिए हैं जिसमें इनकमिंग आने पर पैसा बढ़ जाता है. राहुल भैया ने कहा कि ये बीएसएनएल वाले कॉल दर सस्ती क्यों नहीं करते, जब कम रेट पर अंबानी की कंपनी मुनाफा कमा सकती है तो ये सरकारी कंपनी क्यों महंगाई बनाए हुए हैं. दीदी बोलीं, यही तो.... क्योंकि यदि बीएसएनएल सस्ता हो गया तो लोग हच, एयरटेल, रिलायंस क्यों लेंगे और जब ये मुनाफा नहीं कमाएंगे तो चंदा कैसे देंगे।
खैर, चाय-पानी के बाद जल्दी ही राहुल काम की बात पर आ गए. दीदी को बताए कि घर पर गैस खत्म हो गई है, मां ने सिलेंडर मांगा है. इस महीने की तनख्वाह मिलने पर गैस लौटा दूंगा. दीदी ने कहा, मेरे घर भी एक ही सिलेंडर है. पहले दो-तीन भरकर रखती थी लेकिन अब साग-सब्जी, चावल-दाल, तेल-घी सब महंगा हो गया है तो इतने पैसे नहीं बचते कि स्टॉक रखा जाए. बेचारे राहुल खाली हाथ घर लौट आए. मां को हाल सुनाया. सोनिया ने कहा, ऐसा करो कि तुम मेरे दफ्तर की गैस ले आओ, कहना हमारी खत्म हो गई है. वहाँ गए तो पता चला कि महंगाई से परेशान लोगों का एक झुंड आया था जो गैस सिलेंडर लूटकर ले गया।
साइकिल चला-चलाकर थक गए राहुल घर लौटे और मां को हाल बताया. सोनिया ने शिवराज को फोन लगाया और कहा कि उनके दफ्तर से लूटे गए गैस सिलेंडर को खोजा जाए. शिवराज बोले, पता कर रहा हूं लेकिन जहां तक मेरी खबर है, इसमें पड़ोसियों का हाथ होने के संकेत मिले हैं लेकिन अभी यह पूरी तरह नहीं कहा जा सकता क्योंकि इससे पड़ोसी से आपके संबंधों पर असर पड़ सकता है।
सोनिया भी परेशान हो गईं. झल्लाहट में उन्होंने रेसकोर्स फोन लगाया. पूछा इतनी महंगाई कैसे बढ़ गई है. मनमोहन बोले, चिदंबरम से पूछिए. चिदंबरम से पूछ गया, वो बोले, मनमोहन से पूछिए. सोनिया बोलीं, अरे आम आदमी तो मुझसे पूछेंगे न. तुम तो खास आदमी के सवालों के जवाब देने के लिए हो।
अब राहुल परेशान. भूख बढ़ती जा रही थी, साइकिल चलाने से कमजोरी कुछ ज्यादा ही हो गई थी. मां से बोले, कुछ खाना दो. सोनिया बोलीं, गैस खत्म है तो कुछ बना नहीं है. अचानक सोनिया की आंखों में चमक आ गई, राहुल से बोलीं कि आज मंगलवार है तो तुम ऐसा करो कि मंगल का व्रत रख लो. शाम तक कुछ इंतजाम हो जाएगा. इस बीच मैं राजीव से कह देती हूं कि वो खबर फैला दे कि राहुल बाबा ने मंगल व्रत रखा है ताकि देश में महंगाई खत्म हो और आम आदमी को राहत मिले. राहुल ने कहा, इसे खबर बनाने की क्या जरूरत है. सोनिया बोलीं, इससे तुम दलितों के बाद हिंदुओं के बीच भी हृदय सम्राट बन जाओगे.....
अब इसके बाद तो चमक राहुल की आंखों में थी. भूख का दुख गायब, गैस की चिंता खत्म....................
आगे भी कुछ दिखता लेकिन मेरी अम्मा ने जगा दिया. गैस खत्म हो गई थी। अब उधारी-जुगाड़ी की बारी मेरी थी. लेकिन मंगल का व्रत रखने का सपनैली कांग्रेसमाता का आइडिया मेरी भी आँखों में कौंध रहा था और इससे छलक रही मेरी खुशी का राज जाने बगैर मेरी अम्मा मुझे बावला घोषित कर चुकी थी।
यह एक बावले का बावलापन था या कांग्रेसमाता के आइडिये का दिवालियापन, तय करने में वक्त लगेगा.
मोह तो अब सपनों से भी टूट गया... सच ही कहा है.. सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना... उधारी-जुगाड़ी के सारे प्रयास विफल हो चुके थे. मन में पाश की तरह की कविता हो रही थी.. अम्मा, कितना मुश्किल है बिना गैस के घर लौट कर आना...
जनपथ देवी की जय...
Wednesday, May 21, 2008
चैनलों के दारोगा और आरुषि-हेमराज हत्याकांड...
जयपुर धमाके की पहली ही रात अपनी मेधा से पूरे देश और बाकी दुनिया की आंखें चौंधिया चुके हिंदी चैनलों के पत्रकारों ने उत्तर प्रदेश के नोएडा में एक डॉक्टर परिवार की बेटी और उसके नौकर की हत्या की तहकीकात की रिपोर्टिंग से तो मंत्रमुग्ध ही कर दिया.
जयपुर में धमाके के कुछ ही घंटों के अंदर हरेक हिंदी चैनल हूजी-हूजी, हूजी-हूजी की रट लगाने में जुट चुका था. आधार क्या था, यह जानना और भी दिलचस्प है. मसलन वे बता रहे थे कि चूंकि ये धमाके मंगलवार को किए गए हैं और इससे पहले जिन भी धमाकों में हूजी का नाम आया था, वो भी मंगलवार के ही दिन किए गए थे, इसलिए जयपुर के धमाके में भी हूजी का ही हाथ है.
बस हो गई तफ्तीश, जांच खत्म. नतीजा सामने है.
लेकिन सच यह है कि अभी तक सरकार और दूसरी खुफिया एजेंसियां भी तय नहीं कर पाई हैं कि ये धमाके सचमुच हूजी की ही करतूत है. ऐसा नहीं है कि हूजी ऐसा नहीं कर सकता लेकिन ये कहने और बताने की इतनी जल्दबाजी इन पत्रकारों को क्यों है.
इन पत्रकारों ने बाद में ये बताया कि जिन साइकिलों को धमाके में इस्तेमाल किया गया, उसे बेचने वाले दुकानदारों ने बताया कि खरीदार बांग्ला बोल रहे थे. चूंकि हूजी का गठन बांग्लादेश में हुआ और वहां से ही उसे ज्यादातर खुराक और ताकत मिलती है और बांग्लादेश में भी लोग जमकर बांग्ला बोलते हैं तो ये पक्का हो गया कि धमाके हूजी ने ही किया.
देश के एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक ने गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल के बारे में धमाके की खबर के साथ ही लिखा कि इस तरह की घटना होने पर टीवी चैनलों के पत्रकारों के पास बस वे अकेली पसंद होते हैं. टीवी पत्रकारों को यकीन हो गया है कि सरकार में वही एक आदमी हैं जो फौरी तौर पर धमाके के स्वरूप और उसके पीछे छुपी ताकतों को बिना किसी लाग-लपेट के उगल देंगे. अलबत्ता, कभी-कभी तो मंत्रीजी वह भी बता देते हैं जो सुरक्षा या खुफिया एजेंसियों को भी तब तक नहीं पता होता है.
इस मायने में इस बार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का बयान काफी संतुलित रहा. जयपुर धमाकों की अब तक की जांच के आधार पर राज्य या केंद्र की जांच एजेंसियां किसी संगठन या किसी सरगना का नाम लेने की हालत में नहीं हैं. गिरफ्तारी वगैरह तो दूर की बात है. मनमोहन सिंह ने हूजी या ऐसे किसी भी संगठन को निशाना बनाते हुए कहा कि ये वो ताकतें हैं जो पाकिस्तान के साथ सामान्य हो रहे भारतीय संबंधों में रोड़ा अटकाना चाहती हैं.
अब बात करते हैं नोएडा के आरुषि और हेमराज हत्याकांड की...
पहले ही दिन पत्रकारों ने पुलिस वालों के कहने पर दुनिया को बता दिया कि डॉक्टर राजेश तलवार और उनकी पत्नी डॉक्टर नुपूर तलवार जब रात में सो रहे थे तो उसी दौरान उनके घरेलू नौकर हेमराज ने आरुषि की हत्या कर दी और फरार हो गया. अगली सुबह नौकरी पूरी कर नागरिक जीवन बिता रहे एक पूर्व डीएसपी से पहले आखिर कोई रिपोर्टर उन सीढ़ियों तक क्यों नहीं पहुंच पाया जिसे चढ़कर केके गौतम साहब ने आरुषि के संदिग्ध हत्यारे की लाश ही सामने ला दी.
चूंकि मैंने भी कुछ दिनों तक बिहार में दैनिक जागरण की नौकरी के दौरान एक ब्यूरो कार्यालय में पांच-छह जिलों की क्राइम बीट देखी है इसलिए हत्या, बलात्कार, लूट, डकैती और ऐसे ही कई मामलों को नजदीक से देखने और समझने का थोड़ा-बहुत मौका मिला है. उन दिनों और वहां के पत्रकारों की लिखी खबरों को देखता हूं तो लगता है कि दिल्ली के ज्यादातर क्राइम रिपोर्टर पुलिस प्रवक्ता के तौर पर ही काम करते हैं. उस अनुभव के आधार पर यह लगता है कि चैनलों और अखबारों को भी अब अपने पत्रकारों के प्रवक्ता बनने से कोई एतराज या परहेज नहीं है.
बिहार में आम तौर पर कोई क्राइम रिपोर्टर ऐसा नहीं मिलेगा जो किसी हत्या की खबर करने गया हो और पुलिस वाले के कहे-सुने को ही लिख डाले. वह खुद भी चलता-फिरता है, कुछ सवाल करता है, कुछ जवाब तलाशता है. कम से कम जहां खून हुआ हो, वहां के चप्पे-चप्पे को तो देख ही लेता है. जांच अधिकारी बनकर नहीं तो कम से कम दर्शक बनकर ही. नोएडा में पत्रकार सिर्फ आरुषि के बेडरूम से ही क्यों लौट गए.
दूसरी बात, चूंकि हत्या लड़की की हुई थी तो कई पत्रकारों ने संदेह जता दिया कि हत्या से पहले आरुषि के साथ जबर्दस्ती की गई थी. जबकि आम तौर पर हत्या के बाद भी लड़की के शरीर पर और आसपास बलात्कार के निशान ऊपरी तौर ही मिल जाते हैं. किसी पत्रकार ने ऐसे किसी सबूत का हवाला नहीं दिया कि हत्या से पहले बलात्कार किया गया, ऐसा उन्हें क्यों लगता है. हो सकता है, उसका मुंह बंद करने से पहले हत्यारों ने मुंह काला किया हो, लेकिन इसका कोई सबूत तो दिखेगा. अगर पीड़िता का शरीर सामने हो तो ये अपराध आंखों से छुप नहीं सकते.
तीसरी बात, हत्या इतनी निर्ममता से की गई कि लगता है कातिल बहुत ही सनकी किस्म का था. अखबारों से मालूम हुआ कि बच्ची के शरीर पर चाकुओं के कई निशान थे और सबसे गहरा जख्म गले पर था. इसका एक मतलब तो यह है ही कि लड़की के गले पर हमले से पहले ही शरीर पर चाकू चलाए गए क्योंकि गले पर गहरे हमले के बाद आगे हमले की कोई जरूरत नहीं रह जाती थी. थोड़ा विस्तार से बात करें तो अगर गले पर चाकू चलने से पहले आरुषि ने शरीर के किसी भी हिस्से पर हमला झेला तो वह जग चुकी थी, वो चीखी भी होगी लेकिन पास के कमरे में सो रहे उसके मां-बाप तक उसकी आवाज क्यों नहीं पहुंच सकी, ये मेरी समझ से बाहर है.
निश्चित रूप से पुलिस वालों को भी यह सवाल परेशान कर रहा होगा इसलिए उसके मां-बाप और दूसरे रिश्तेदारों से भी पूछताछ हो रही है. कुछ चैनलों पर दिखा कि राजेश और नुपूर के बयान में अंतर या यूं कहें कि विरोधाभास है. ऐसा है तो साफ है कि दोनों पूरा सच नहीं बोल रहे हैं और अगर झूठ बोल रहे हैं तो दोनों में तालमेल की कमी है जो पुलिस के सामने जाहिर हो जा रही है. लेकिन मां-बाप को संदिग्ध हत्यारे की तरह पेश करने से पहले पत्रकारों को बहुत ठोस और तार्किक सबूतों का इंतजार कर लेना चाहिए था क्योंकि जो उनकी छवि का जो नुकसान चैनल वाले कर जाएंगे, उसकी भरपाई करने वो दोबारा सेक्टर 25 के जलवायु विहार कभी नहीं जाएंगे.
Saturday, May 17, 2008
बॉलीवुड के कमीशन एजेंट हैं ये समाचार चैनल...
पता नहीं हर सप्ताह फ्लॉप और बकवास फिल्में देखने के लिए लोगों को उकसाने के एवज में ये सारे समाचार चैनल कितने पैसे लेते हैं. सोमवार से जो ये गाना गाना शुरू करते हैं तो शुक्रवार को फिल्म के रिलीज होने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ते हैं.
इन चैनलों के चक्कर में मैंने इतनी सारी सिरदर्द फिल्में देख ली हैं कि हजारों रुपए की बद्दुआ उनका पीछा नहीं छोड़ेगी. पिछले शनिवार को टशन देखने चला गया था, टेंशन हो गया. जब आदित्य चोपड़ा के निर्देशक को तंबाकू खाने का तरीका नहीं मालूम था तो अनिल कपूर को तंबाकू खिलाने की जरूरत ही क्या थी?
और पुराने जमाने में सफल फिल्में बनाने वाली भी ऐसी चाट और सिरखाऊ फिल्में पेश करे हैं कि अब नाम पर से भरोसा ही उठ गया है. यश चोपड़ा साहब की झूम बराबर झूम, नील एंड निक्की हो या यश जौहर की कंपनी की कभी अलविदा न कहना.
अमिताभ बच्चन का फिल्म में होना कहीं फिल्म के हिट होने की गारंटी है क्या.
खैर, बॉलीवुड के इस दोगलेपन का नतीजा यह निकला है कि अब कोई फिल्म दो सप्ताह से ज्यादा नहीं टिक पाती. दर्शक दो दिनों में फिल्मों का हिसाब कर लेते हैं. वो तो भला हो मल्टीप्लेक्सों का कि कुछ हजार लोग भी फिल्म देख लें तो फिल्में घाटे से उबर जाती हैं.
दूसरा असर यह हुआ है कि पश्चिमी रंग-ढंग में अंग्रेजी-हिंदी मिक्स करके गाना और फिल्म बनाने के चक्कर में अंग्रेजीदाँ लोगों ने इतने नर्क बोए कि अब बिहार, यूपी जैसे बड़े हिंदी बाजार में अधिकांश सिनेमा घरों में भोजपुरी फिल्में चलती हैं.
कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि देश के तमाम बड़े-बड़े पत्रकारों ने जिस तरह से अंग्रेजी में लिखकर हिंदी अखबारों का पन्ना भड़ा है और अब भी भड़ रहे हैं, ये फिल्में भी उसी तरह हिंदी के बाजार से अंग्रेजी का घर भर रही हैं.
बेसिर-पैर की कहानी, पारिवारिक मूल्यों को तोड़ती कहानी, युवाओं को ललचाती कहानी...गांवों को नहीं लुभा पा रही हैं. गाँव के लोगों की नजर में पथभ्रष्ट और चियरलीडर्स को देखकर फूले जा रहे मध्यवर्ग को साधने के चक्कर में साधारण लोग क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों को हिट करा रहे हैं.
जबकि कोई भी भोजपुरी फिल्म बिहार-यूपी में पाँच सप्ताह से ज्यादा चल जाती है क्योंकि उसे देखकर लोगों को लगता है कि ये कुछ आसपास की कहानी है.
बॉलीवुड की फिल्में जब मैंने देखनी शुरू की थी तब हिट होने के लिए फिल्म का कम से कम पचास दिन चलना जरूरी माना जाता था. सौ दिन चले बिना सुपरहिट होना संभव ही नहीं था.
लेकिन ये चैनल वाले हर सप्ताह बताते हैं कि कैटरीना कैफ की ये, सलमान खान की वो, शाहरुख की फलाँ, अमिताभ की ढेकानाँ फिल्म सुपरहिट रही. काहे कि हिट भैया. तुमने गाया नहीं होता तो औकात पता चल जाती. कमीशन खाए चैनलों के प्रचार से दिग्भ्रमित लोग सिनेमा हॉल से जब तक लौटते हैं, फिल्म हिट हो जाती है.
ये हिंदी की खाने वाले आखिर गा किसकी रहे हैं. हिंदी फिल्मों के अभिनेता, अभिनेत्री, निर्देशक, सब के सब अपनी फिल्मों के प्रचार में, भले ही हिंदी चैनल पर क्यों न हों, अंग्रेजी बोलकर कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका के दर्शकों को लुभा रहे हैं. कुछ जादू दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों पर भी चल जाता है लेकिन गांव और छोटे शहर धीरे-धीरे इनकी पकड़ से बाहर निकल रहे हैं.
सब कुछ ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हिंदी बोलने, सुनने और हिंदी को जीने वाली बड़ी आबादी बॉलीवुड फिल्मों को भी हॉलीवुड की तरह देखने लगेगी.
गांवों में हॉलीवुड की फिल्मों को जिस रूप में देखा जाता है, वो तो आप समझते ही होंगे...