पापा भगवानपुर के बीडीओ ऑफिस में थे. मैं चौथी-पांचवीं में रहा होगा. घर पर ट्यूशन पढ़ाने एक गुरुजी आते थे. जहां तक याद है, नाम अर्जुन सर था.
घर पर करने के लिए दिए गए काम पूरे न करने या गलतियां करने पर वे मुठ्ठियां बंद करवाकर उंगलियों के जड़ पर बाहर से चोट करते थे.
हमारे सरकारी क्वार्टर से एक किलोमीटर की दूरी पर बलान नदी बहती थी और उसके पार एक गांव था, दामोदरपुर. सर वहीं के रहने वाले थे.
ट्यूशन के दौरान ही सर की शादी हुई. शादी के कुछ दिन बाद जब वे फिर से पढ़ाने आए तो एक दिन मुझे और मेरी बहन को अपने घर ले गए, मैडम से मिलवाने.
पहले साईकिल से नदी के घाट तक, वहां से नाव और नाव से उतरने के बाद फिर साईकिल से हम तीनों दामोदरपुर पहुंचे.
लड्डू खाए, दही खाई. दही के सामने सब बेकार. सारी चीजें सर ने ही लाकर परोसी. पानी भी.
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