मेरे शहर से कल अमर भैया आए हैं. पूरा नाम अमरेंद्र कुमार अमर है. हम दोनों ने कभी साथ में पत्रकारिता की थी, कस्बाई. वैचारिक प्रतिबद्धता के लिहाज से हम दोनों आमने-सामने हैं. वे तब प्रसार भारती से जुड़े थे. आजकल भारतीय जनता पार्टी के जिला महासचिव हैं. पेशे से वकील हैं. आपराधिक मामलों में बचाव पक्ष की ओर से कोर्ट में पेश होते हैं. दैनिक जागरण में क्राइम की खबरें भी देखने के नाते भी हमारे संबंध बहुत गहरे हैं.
बेगूसराय के हम पत्रकार मित्र उन्हें अध्यक्ष जी ही बोलते हैं. हमने बुजुर्ग लोगों के प्रेस क्लब की सदस्यता न मिलने पर जिला पत्रकार संघ बनाया था और उसके वे पहले अध्यक्ष चुने गए.
सोमवार से शुरू हो रही भाजपा की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में शामिल होने के लिए उनके साथ जिलाध्यक्ष श्रीबाबू और पूर्व जिलाध्यक्ष शंकर दा भी आए हैं. अमर भैया के ठरहने की ज्यादा बेहतर व्यवस्था कहीं और थी लेकिन मेरे आग्रह को वे टाल नहीं सके और लॉजनुमा व्यवस्था वाले मेरे घर पर रुके हैं. श्रीबाबू और शंकर दा पहले से तय जगह पर रुके हैं.
उनकी निर्धारित व्यवस्था से उन्हें अलग रोकने के लिए जुर्माना तय हुआ कि मैं उन्हें दोनों दिन उनके सम्मेलन स्थल रामलीला मैदान पहुँचाऊँगा.
सोमवार को भाजपा की बैठक के पहले दिन अमर भैया को रामलीला मैदान पहुँचाने के बाद जब मैं लौट रहा था तो टाइम्स ऑफ इंडिया के सामने सड़क पर मेरी नजर दिल्ली के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जयप्रकाश अग्रवाल जी की औसत आकार की एक होर्डिंग पर पड़ी.
अग्रवाल साहब ने इस होर्डिंग के जरिए दिल्ली के लोगों को गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ दी हैं. उनके ऐसे कई और होर्डिंग भी शहर में लगे होंगे लेकिन मुझे फिलहाल एक ही दिखा है. इस होर्डिंग के नीचे एक कूरियर कंपनी ब्लेज़फ्लैश के बारे में भी कुछ-कुछ लिखा है.
कांग्रेस की "विश्वसनीयता" को ब्लेज़फ्लैश भुना रही है या ब्लेज़फ्लैश की "संपन्नता" को कांग्रेसी नेता, इस पर मेरी तरफ से कहने के लिए कुछ नहीं है. ये चीजें बड़ी आम हो गई हैं. वैसे, हो यह भी सकता है कि इस कूरियर कंपनी के मालिक वे खुद हों या इस होर्डिंग को लगाने से पहले उनसे पूछा न गया हो और कंपनी वाले ने अपनी तरफ से उनके नाम से कुछ कर दिया हो.
मेरे मन में जो सवाल है वह यह कि क्या देश की मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय पार्टी के पास पैसों की इतनी कमी हो गई है कि उसके नेताओं को "प्रचार" सामग्री में प्रायोजक संग हिस्सेदारी करनी पड़े. अब अगर कल को जयप्रकाश बाबू को केंद्र में संचार मंत्री बनने का मौका मिल जाए और सरकार डाक विभाग में विनिवेश की सोच रही हो तो इसका फायदा कौन उठाएगा, कहने की जरूरत नहीं है.
जयप्रकाश जी की तस्वीर अखबारों और टीवी के अलावा इस शहर के छोटे-बड़े नेताओं के पोस्टर के साथ तमाम इलाकों में हैं. कुछ दिनों पहले तक जिन लोगों ने रामबाबू शर्मा के नाम की होर्डिंग लगा रखी थी, अब वे जयप्रकाश जी की जय-जयकार कर रहे हैं. लोग बदल जाते हैं, नेता बदल जाते हैं, समर्थक भी लेकिन इस तरह के "समर्थक" नहीं बदलते और पाई-पाई वसूलने की ताक में, जब तक आस हो, तब तक लगे रहते हैं.
थोड़ी कल्पना करें और यह चलन और आगे तक जाए तो क्या-क्या हो सकता है....
तालकटोरा स्टेडियम में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआईसीसी) की महाधिवेशन हो और मंच पर बैनर के नीचे प्रायोजक के बतौर रिलायंस इंडस्ट्रीज या शाहरुख खान की किसी कंपनी का नाम हो.
भाजपा का ही इसी तरह का कोई सम्मेलन हो तो मंच पर फिर रिलायंस इंडस्ट्रीज का नाम मिल सकता है.
समाजवादी पार्टी के सम्मेलन में सहारा का बैनर नजर आ सकता है. ऐसे में कम्युनिस्टों का सम्मेलन यमुना किनारे ही हो पाएगा.
कुछ दिनों में इस तरह के राजनीतिक आयोजनों में मीडिया पार्टनर भी नजर आ सकते हैं, वैसे ही जैसे मल्टीप्लेक्सों में फिल्म शुरू होने के बाद कुछ के नाम दिखाए जाते हैं.
जया अम्मा और करुणा बाबा को छोड़ ही दीजिए क्योंकि उनके तो चैनल खुलकर चल रहे हैं.
लेकिन घोषित रूप से कांग्रेस के मीडिया पार्टनर कौन-कौन हो सकते हैं, भाजपा के प्रचार का जिम्मा कौन सही से निभा सकता है, सपा की गारंटी कौन ले सकते हैं और और बसपा के हाथी का महावत कौन बन सकता है....राजद, लोजपा, जदयू...भी चुनौती कायम रखने के लिए क्या संभावित मीडिया पार्टनर पैदा कर सकते हैं.
आप तो जनता-जनार्दन हैं, अगर ऊपर दिए गए सवालों के जवाब मालूम हों तो मात्र छह रुपए खर्च करके संबंधित चैनल या अखबार को अपना एसएमएस भेजें. देश का भविष्य संवारने में आपका यह एसएमएस उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है जो आपने भारत रत्न के दावेदारों के समर्थन में किए थे.
हमें चैनल और अखबारों में आपके एसएमएस नतीजों का इंतजार रहेगा.
हिदायत यह है कि आप अपने एसएमएस का प्रमाण साथ में रखें क्योंकि आप एसएमएस के न मिलने या उसके गुणा-गणित में धोखाधड़ी के शिकार भी हो सकते हैं.
Monday, January 28, 2008
Sunday, January 20, 2008
नौ साल बाद कोई चिट्ठी लिख रहा हूं...
प्रिय प्रभाकर जी,
आशा है आप सपरिवार अच्छे से होंगे. संजय भैया और सरजमीं परिवार भी ठीक-ठाक होगा. अशांत जी स्वस्थ होंगे.
मोबाइल पर आपने बताया कि सरजमी के गणतंत्र दिवस विशेषांक के लिए कुछ लिखना है. लिखने के इस न्योते की जो खुशी मुझे हो रही है, उसे मैं बयां नहीं कर सकता. मैंने भी अपने करिअर की शुरुआत आपके ही अखबार से की थी.
आज जब मैं घर से, अपने शहर से, आप सबसे दूर हूं, तब भी आप लोगों का ये स्नेह और प्यार भावुक कर देता है. मुझे क्या लिखना चाहिए, यह सोचने और तय करने में एक सप्ताह लग गया.
और मैंने यह तय किया है कि गणतंत्र दिवस या बेगूसराय के बारे में कुछ बघारने से बेहतर यह लिखना होगा कि जो लोग पढ़ने के लिए या काम की तलाश में बेगूसराय से बाहर निकलना चाहते हैं, उन्हें फौरी तौर पर खुद में क्या बदलाव लाना चाहिए.
इससे पहले की कुछ काम की बातें कहूं यह जरूर बताना चाहूंगा और इसके लिए आपको धन्यवाद भी देना चाहूंगा कि करीब नौ साल बाद मैं कुछ भी चिट्ठी के तौर पर लिख रहा हूं. डाकघर गए इससे भी ज्यादा समय बीत चुके हैं और अब मैं अपने मोहल्ले के डाकिए को भी नहीं पहचानता. अंतिम चिट्ठी मैंने एक प्रकाशक को कानूनी नोटिस को लेकर लिखा था.
अब बहुत सी चीजें बदल चुकी हैं. मां से, पापा से, चच्चा से, पाठक चा और श्याम चा से... और आपसे भी, मोबाइल पर ही बातें हो जाती हैं. जितनी बातें हम कुछ मिनटों में कर लेते हैं, अगर उसे लिखना होता तो पता नहीं कितने पन्नों पर उंगलियां घिसनी पड़तीं और उस संवाद को पूरा होने में कुछ महीने जरूर जाया हो जाते.
हो तो यह भी सकता था कि आपका विशेषांक छपने के बाद मेरा लेख पहुंचा ही होता. तकनीक ने कई चीजें बदल दी है. हमारा-आपका काम भी इससे अछूता नहीं है. इसलिए हम सबको भी तेजी से बदलने के लिए तैयार रहना चाहिए.
दिल्ली में पत्रकारिता के अलावा भी कई तरह के काम हैं जिससे लोग घर-परिवार का खर्च उठाने लायक कमा सकते हैं. मैं बात सिर्फ दिल्ली की करुंगा लेकिन आप दिल्ली की बजाय मुंबई, चंडीगढ़, जयपुर, कानपुर, भोपाल के लिए भी इन बातों को बराबर ही मान कर चलें.
बेगूसराय की पत्रकारिता और दिल्ली की पत्रकारिता में सबसे बड़ा अंतर यह है कि वहां आप हिन्दी की खाते हैं और हिन्दी की ही गाते हैं. हमारे साथ हिन्दी का खाना तो ठीक है लेकिन गाना अंग्रेजी का पड़ता है. हिन्दी के अखबारों या चैनलों में नौकरी देने से पहले जो परीक्षा ली जाती है, उसमें संपादक लोग अंग्रेजी की ही परख करते हैं.
हिन्दी प्रेम में बहे बिना यह भी साफ कर दूं कि इसका एक व्यवहारिक कारण यह है कि यहां देश और दुनिया के हरेक हिस्से की खबर आती है। हमें उन खबरों से जूझना होता है. अब अमेरिका वाले या चेन्नई वाले हमारी लिए हिंदी में तो लिखेंगे नहीं. लेकिन हमें अपने पाठकों के लिए उनकी अंग्रेजी को समझकर हिन्दी में ही लिखना होगा.
इसलिए आप जागरण में आएं या हिन्दुस्तान में जाएं, अंग्रेजी की अग्निपरीक्षा से तो गुजरना ही होगा. और अगर अंग्रेजी ठीक नहीं हो तो हिन्दी का आपका सारा ज्ञान संपादकों के लिए बेकार की चीज है. हिन्दी में विकलांग भी हों लेकिन अंग्रेजी से स्वस्थ हों तो संपादक मौका दे सकता हैं.
इसलिए अगर आप या आपका कोई परिचित दिल्ली आने की तैयारी कर रहा हो तो उसे कुछ अंग्रेजी अखबार और अंग्रेजीदां मास्टर साहब की संगत डाल लेनी चाहिए.
दिल्ली में पत्रकार सिर्फ हिंदी में बोलते और लिखते हैं, सुनने और पढ़ने का ज्यादातर काम अंग्रेजी में ही करना पड़ता है. मैं भी बिना अंग्रेजी अखबार पढ़े दिल्ली आ गया था लेकिन किस्मत से उस जगह पहुंच गया जहां से निकलने के बाद किसी ने उस कमजोरी पर हाथ नहीं दिया। नहीं तो हर रोज देखता हूं कि मेरे संपादक दो-चार लोगों को इकोनॉमिक टाइम्स या टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर का अनुवाद करने देते हैं और उसे देखने के बाद कहते हैं कि इसमें अनुवाद की कुल 26 गलतियां हैं और मात्रा के 32 दोष हैं।
इसे ठीक किए बिना भी कहीं-कहीं और कभी-कभी दिल्ली में नौकरी मिल जाती है. लेकिन वह बस नौकरी ही रह जाती है. तरक्की, सम्मान और दूसरी चीजें कभी नहीं मिल पातीं.
तो पहली बात हिन्दी और अंग्रेजी को साथ लेकर चलने की रही.
दूसरी बात यह है कि दिल्ली आने से पहले कुछ काम उच्चारण पर भी कर लें तो ढ़ेर सारी बेवजह की फजीहत से बच जाएंगे. मेरी ही बात लीजिए. मैं आज तक अपना नाम सही से नहीं ले सका हूं. जब मैं रीतेश बोलता हूं तो असल में रीतेस बोल रहा होता हूं. दिल्ली के लोग ऐसा नहीं बोलते. चंडीगढ़ वाले भी शुद्ध बोलते हैं.
आदरणीय गुरुजनों से एक अनुरोध है कि अगर वे कुछ कर सकते हैं तो कम से कम पहली-दूसरी से ही बच्चों के उच्चारण पर कुछ ध्यान जरूर दें. नहीं तो सारी पढ़ाई पर उस समय शर्म आती है जब मैं अपना नाम भी सही से नहीं बोल पाता हूं. मेरे उच्चारण में सिर्फ इसलिए दोष नहीं हो सकता कि मैं बेगूसराय में पैदा हुआ हूं. अगर चंडीगढ़ के लोग सही बोल सकते हैं तो हम भी बोल सकते हैं.
इसलिए मेरा तो यही मानना है कि परवरिश और पढ़ाई में ही कुछ ढ़िलाई रह गई होगी कि यह कमी दूर नहीं हो सकी. गुरुजी लोगों को यह काम तो करना ही चाहिए.
और आखिरी बात, बेगूसराय में तो बड़ी संख्या में नौकरी है नहीं. शहर छोड़ना ही होगा. सरकार के पास नौकरी देने की कोई ठोस योजना एक तो है नहीं और अगर है भी तो जनसंख्या के लिहाज से वह बड़ी आबादी के काम की नहीं है.
अगर आप इंजीनियर, डॉक्टर, सीए, वकील या किसी खास पेशेवर डिग्री से लैस नहीं हैं तो दिल्ली, मुंबई या ऐसे ही बड़े शहरों में जो नौकरियां हैं उसमें कॉल सेंटर और इंटरनेट पर कारोबार कर रही कंपनियों का ही योगदान है. इंटरनेट और कॉल सेंटर का कोई भी कारोबार बिना अंग्रेजी के चल नहीं सकता. इसके लिए कम्प्यूटर की भी ठीक-ठाक समझ होनी ही चाहिए. ये नौकरियां अब पटना तक भी पहुंच रही हैं लेकिन उसकी पात्रता नहीं बदली है.
नौकरी आप कहीं करें, जिस तरह की नौकरियां अब बाजार में हैं, उसमें अंग्रेजी और शुद्ध उच्चारण के बिना गुजारा नहीं है.
इसलिए गणतंत्र दिवस के मौके पर आरएस गवई साहब क्या बोलते हैं, नीतीश कुमार क्या कह रहे हैं, राजीव रंजन सिंह क्या कहना चाहते हैं, संजीव हंस क्या बताना चाहते हैं... आपके लिए किसी काम की नहीं है. इस दिन का हमारे और आपके लिए सही इस्तेमाल यही है कि हम अंग्रेजी और हिन्दी के साथ कोई भेदभाव किए बिना कल से पढ़ने की कोशिश शुरू कर दें. कोई गलत बोल रहा तो तो उसे उच्चारण ठीक करने की सलाह दें, सुधारने के तरीके बताएं और पहली गाड़ी पकड़ कर जहां भी नौकरी मिल रही है, उसे झटकने के लिए चल पड़ें.
इस बीच मैंने इंटरनेट पर गूगल में बेगूसराय का न्यूज अलर्ट लगा लिया है. अच्छी चीजें तो खबरों की परिभाषा से बाहर कर दी गई हैं. जब वहां खून होता है, गोली चलती है, बांध टूटता है, सचमुच कोई "खबर" बनती है तो मेरा जीमेल आपके फोन से पहले मुझे बता देता है कि कुछ हो गया है. यही तकनीक है और उसकी ताकत भी. आप भी इस ताकत को महसूस करें और दूसरों को भी ताकतवर बनने की सलाह दें.
बाकी बातें मोबाइल पर करेंगे. आपके अखबार की एक प्रति पाने का अधिकारी हूं, बस इसे याद रखिएगा. विशेषांक बेहतर हो और सफल हो, मेरी शुभकामनाएं हैं.
आपका
रीतेश
20-01-2008
आशा है आप सपरिवार अच्छे से होंगे. संजय भैया और सरजमीं परिवार भी ठीक-ठाक होगा. अशांत जी स्वस्थ होंगे.
मोबाइल पर आपने बताया कि सरजमी के गणतंत्र दिवस विशेषांक के लिए कुछ लिखना है. लिखने के इस न्योते की जो खुशी मुझे हो रही है, उसे मैं बयां नहीं कर सकता. मैंने भी अपने करिअर की शुरुआत आपके ही अखबार से की थी.
आज जब मैं घर से, अपने शहर से, आप सबसे दूर हूं, तब भी आप लोगों का ये स्नेह और प्यार भावुक कर देता है. मुझे क्या लिखना चाहिए, यह सोचने और तय करने में एक सप्ताह लग गया.
और मैंने यह तय किया है कि गणतंत्र दिवस या बेगूसराय के बारे में कुछ बघारने से बेहतर यह लिखना होगा कि जो लोग पढ़ने के लिए या काम की तलाश में बेगूसराय से बाहर निकलना चाहते हैं, उन्हें फौरी तौर पर खुद में क्या बदलाव लाना चाहिए.
इससे पहले की कुछ काम की बातें कहूं यह जरूर बताना चाहूंगा और इसके लिए आपको धन्यवाद भी देना चाहूंगा कि करीब नौ साल बाद मैं कुछ भी चिट्ठी के तौर पर लिख रहा हूं. डाकघर गए इससे भी ज्यादा समय बीत चुके हैं और अब मैं अपने मोहल्ले के डाकिए को भी नहीं पहचानता. अंतिम चिट्ठी मैंने एक प्रकाशक को कानूनी नोटिस को लेकर लिखा था.
अब बहुत सी चीजें बदल चुकी हैं. मां से, पापा से, चच्चा से, पाठक चा और श्याम चा से... और आपसे भी, मोबाइल पर ही बातें हो जाती हैं. जितनी बातें हम कुछ मिनटों में कर लेते हैं, अगर उसे लिखना होता तो पता नहीं कितने पन्नों पर उंगलियां घिसनी पड़तीं और उस संवाद को पूरा होने में कुछ महीने जरूर जाया हो जाते.
हो तो यह भी सकता था कि आपका विशेषांक छपने के बाद मेरा लेख पहुंचा ही होता. तकनीक ने कई चीजें बदल दी है. हमारा-आपका काम भी इससे अछूता नहीं है. इसलिए हम सबको भी तेजी से बदलने के लिए तैयार रहना चाहिए.
दिल्ली में पत्रकारिता के अलावा भी कई तरह के काम हैं जिससे लोग घर-परिवार का खर्च उठाने लायक कमा सकते हैं. मैं बात सिर्फ दिल्ली की करुंगा लेकिन आप दिल्ली की बजाय मुंबई, चंडीगढ़, जयपुर, कानपुर, भोपाल के लिए भी इन बातों को बराबर ही मान कर चलें.
बेगूसराय की पत्रकारिता और दिल्ली की पत्रकारिता में सबसे बड़ा अंतर यह है कि वहां आप हिन्दी की खाते हैं और हिन्दी की ही गाते हैं. हमारे साथ हिन्दी का खाना तो ठीक है लेकिन गाना अंग्रेजी का पड़ता है. हिन्दी के अखबारों या चैनलों में नौकरी देने से पहले जो परीक्षा ली जाती है, उसमें संपादक लोग अंग्रेजी की ही परख करते हैं.
हिन्दी प्रेम में बहे बिना यह भी साफ कर दूं कि इसका एक व्यवहारिक कारण यह है कि यहां देश और दुनिया के हरेक हिस्से की खबर आती है। हमें उन खबरों से जूझना होता है. अब अमेरिका वाले या चेन्नई वाले हमारी लिए हिंदी में तो लिखेंगे नहीं. लेकिन हमें अपने पाठकों के लिए उनकी अंग्रेजी को समझकर हिन्दी में ही लिखना होगा.
इसलिए आप जागरण में आएं या हिन्दुस्तान में जाएं, अंग्रेजी की अग्निपरीक्षा से तो गुजरना ही होगा. और अगर अंग्रेजी ठीक नहीं हो तो हिन्दी का आपका सारा ज्ञान संपादकों के लिए बेकार की चीज है. हिन्दी में विकलांग भी हों लेकिन अंग्रेजी से स्वस्थ हों तो संपादक मौका दे सकता हैं.
इसलिए अगर आप या आपका कोई परिचित दिल्ली आने की तैयारी कर रहा हो तो उसे कुछ अंग्रेजी अखबार और अंग्रेजीदां मास्टर साहब की संगत डाल लेनी चाहिए.
दिल्ली में पत्रकार सिर्फ हिंदी में बोलते और लिखते हैं, सुनने और पढ़ने का ज्यादातर काम अंग्रेजी में ही करना पड़ता है. मैं भी बिना अंग्रेजी अखबार पढ़े दिल्ली आ गया था लेकिन किस्मत से उस जगह पहुंच गया जहां से निकलने के बाद किसी ने उस कमजोरी पर हाथ नहीं दिया। नहीं तो हर रोज देखता हूं कि मेरे संपादक दो-चार लोगों को इकोनॉमिक टाइम्स या टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर का अनुवाद करने देते हैं और उसे देखने के बाद कहते हैं कि इसमें अनुवाद की कुल 26 गलतियां हैं और मात्रा के 32 दोष हैं।
इसे ठीक किए बिना भी कहीं-कहीं और कभी-कभी दिल्ली में नौकरी मिल जाती है. लेकिन वह बस नौकरी ही रह जाती है. तरक्की, सम्मान और दूसरी चीजें कभी नहीं मिल पातीं.
तो पहली बात हिन्दी और अंग्रेजी को साथ लेकर चलने की रही.
दूसरी बात यह है कि दिल्ली आने से पहले कुछ काम उच्चारण पर भी कर लें तो ढ़ेर सारी बेवजह की फजीहत से बच जाएंगे. मेरी ही बात लीजिए. मैं आज तक अपना नाम सही से नहीं ले सका हूं. जब मैं रीतेश बोलता हूं तो असल में रीतेस बोल रहा होता हूं. दिल्ली के लोग ऐसा नहीं बोलते. चंडीगढ़ वाले भी शुद्ध बोलते हैं.
आदरणीय गुरुजनों से एक अनुरोध है कि अगर वे कुछ कर सकते हैं तो कम से कम पहली-दूसरी से ही बच्चों के उच्चारण पर कुछ ध्यान जरूर दें. नहीं तो सारी पढ़ाई पर उस समय शर्म आती है जब मैं अपना नाम भी सही से नहीं बोल पाता हूं. मेरे उच्चारण में सिर्फ इसलिए दोष नहीं हो सकता कि मैं बेगूसराय में पैदा हुआ हूं. अगर चंडीगढ़ के लोग सही बोल सकते हैं तो हम भी बोल सकते हैं.
इसलिए मेरा तो यही मानना है कि परवरिश और पढ़ाई में ही कुछ ढ़िलाई रह गई होगी कि यह कमी दूर नहीं हो सकी. गुरुजी लोगों को यह काम तो करना ही चाहिए.
और आखिरी बात, बेगूसराय में तो बड़ी संख्या में नौकरी है नहीं. शहर छोड़ना ही होगा. सरकार के पास नौकरी देने की कोई ठोस योजना एक तो है नहीं और अगर है भी तो जनसंख्या के लिहाज से वह बड़ी आबादी के काम की नहीं है.
अगर आप इंजीनियर, डॉक्टर, सीए, वकील या किसी खास पेशेवर डिग्री से लैस नहीं हैं तो दिल्ली, मुंबई या ऐसे ही बड़े शहरों में जो नौकरियां हैं उसमें कॉल सेंटर और इंटरनेट पर कारोबार कर रही कंपनियों का ही योगदान है. इंटरनेट और कॉल सेंटर का कोई भी कारोबार बिना अंग्रेजी के चल नहीं सकता. इसके लिए कम्प्यूटर की भी ठीक-ठाक समझ होनी ही चाहिए. ये नौकरियां अब पटना तक भी पहुंच रही हैं लेकिन उसकी पात्रता नहीं बदली है.
नौकरी आप कहीं करें, जिस तरह की नौकरियां अब बाजार में हैं, उसमें अंग्रेजी और शुद्ध उच्चारण के बिना गुजारा नहीं है.
इसलिए गणतंत्र दिवस के मौके पर आरएस गवई साहब क्या बोलते हैं, नीतीश कुमार क्या कह रहे हैं, राजीव रंजन सिंह क्या कहना चाहते हैं, संजीव हंस क्या बताना चाहते हैं... आपके लिए किसी काम की नहीं है. इस दिन का हमारे और आपके लिए सही इस्तेमाल यही है कि हम अंग्रेजी और हिन्दी के साथ कोई भेदभाव किए बिना कल से पढ़ने की कोशिश शुरू कर दें. कोई गलत बोल रहा तो तो उसे उच्चारण ठीक करने की सलाह दें, सुधारने के तरीके बताएं और पहली गाड़ी पकड़ कर जहां भी नौकरी मिल रही है, उसे झटकने के लिए चल पड़ें.
इस बीच मैंने इंटरनेट पर गूगल में बेगूसराय का न्यूज अलर्ट लगा लिया है. अच्छी चीजें तो खबरों की परिभाषा से बाहर कर दी गई हैं. जब वहां खून होता है, गोली चलती है, बांध टूटता है, सचमुच कोई "खबर" बनती है तो मेरा जीमेल आपके फोन से पहले मुझे बता देता है कि कुछ हो गया है. यही तकनीक है और उसकी ताकत भी. आप भी इस ताकत को महसूस करें और दूसरों को भी ताकतवर बनने की सलाह दें.
बाकी बातें मोबाइल पर करेंगे. आपके अखबार की एक प्रति पाने का अधिकारी हूं, बस इसे याद रखिएगा. विशेषांक बेहतर हो और सफल हो, मेरी शुभकामनाएं हैं.
आपका
रीतेश
20-01-2008
Sunday, December 30, 2007
सहारा समय ने बनाया फ़हीम को बेनज़ीर का वारिस...
सहारा समय परिवार के वारिसों को या तो यह नहीं मालूम है कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने किसे बेनज़ीर भुट्टो का राजनीतिक वारिस चुना है या फिर लरकाना की जिस बैठक के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता मख़दूम अमीन फ़हीम ने ख़ुद पत्रकारों से कहा कि बेनज़ीर के इकलौते बेटे बिलावल भुट्टो जरदारी को उनलोगों ने अपना नया अध्यक्ष चुन लिया है, उसमें सहारा समय का कोई ख़ास सूत्र मौज़ूद था.

रात के बारह बज़े जब मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं तब तक पूरी दुनिया की हरेक साइट इस बात को दिखा और बता रही है कि बिलावल को बेनज़ीर का राजनीतिक वारिस चुन लिया गया है.
बेनज़ीर ने अपनी वसीयत में पति आसिफ अली ज़रदारी को उत्तराधिकारी मनोनीत किया था लेकिन बैठक में ख़ुद ज़रदारी ने ही बिलावल के नाम का प्रस्ताव रखा और पार्टी के तमाम बड़े नेताओं ने उसका अनुमोदन कर दिया.
अलबत्ता, पार्टी ने 19 साल के बिलावल की उम्र और उसकी पढ़ाई का ख्याल करते हुए पार्टी में दो सह-अध्यक्ष बनाए हैं. एक तो बिलावल के पिता और बेनज़ीर के पति आसिफ अली जरदारी हैं और दूसरे वो फ़हीम साहब, जिन्हें सहारा समय परिवार पीपीपी की क़मान थमा रहा है. हाँ, पार्टी ने ये कहा है कि अगर जनवरी में चुनाव हों और वह जीत जाती है तो इस वक़्त प्रधानमंत्री के उम्मीदवार फ़हीम साहब होंगे.
ख़बरें तो इससे आगे पहुँच चुकी हैं. बैठक के बाद बिलावल के अध्यक्ष चुने जाने की घोषणा के दौरान आसिफ अली जरदारी ने पीपीपी के चुनाव में हिस्सा लेने का निर्णय सुनाया और नवाज़ शरीफ़ से भी चुनाव में भाग लेने की अपील की.
नवाज़ की पार्टी के कुछ नेताओं ने देर रात बयान दिया है कि वे भी 8 जनवरी के चुनाव में हिस्सा लेंगे. ये और बात है कि पीएमएल क्यू और ख़ुद राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ शायद चुनाव को टालने का विचार रखते हों.
पता नहीं, सहारा समय का समय ख़राब चल रहा है या ख़बरों को इसी तरह से पेश कर वह ख़ुद को सबसे अलग साबित करना चाहता है.
आप भी पढ़ें ये ख़बरें......
अंग्रेज़ी साइटः-http://www.saharasamay.com/samayhtml/articles.aspx?newsid=91883
हिन्दी साइटः-
http://www.saharasamay.com/flash/hindi/#fullstory?id=110079

रात के बारह बज़े जब मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं तब तक पूरी दुनिया की हरेक साइट इस बात को दिखा और बता रही है कि बिलावल को बेनज़ीर का राजनीतिक वारिस चुन लिया गया है.
बेनज़ीर ने अपनी वसीयत में पति आसिफ अली ज़रदारी को उत्तराधिकारी मनोनीत किया था लेकिन बैठक में ख़ुद ज़रदारी ने ही बिलावल के नाम का प्रस्ताव रखा और पार्टी के तमाम बड़े नेताओं ने उसका अनुमोदन कर दिया.
अलबत्ता, पार्टी ने 19 साल के बिलावल की उम्र और उसकी पढ़ाई का ख्याल करते हुए पार्टी में दो सह-अध्यक्ष बनाए हैं. एक तो बिलावल के पिता और बेनज़ीर के पति आसिफ अली जरदारी हैं और दूसरे वो फ़हीम साहब, जिन्हें सहारा समय परिवार पीपीपी की क़मान थमा रहा है. हाँ, पार्टी ने ये कहा है कि अगर जनवरी में चुनाव हों और वह जीत जाती है तो इस वक़्त प्रधानमंत्री के उम्मीदवार फ़हीम साहब होंगे.
ख़बरें तो इससे आगे पहुँच चुकी हैं. बैठक के बाद बिलावल के अध्यक्ष चुने जाने की घोषणा के दौरान आसिफ अली जरदारी ने पीपीपी के चुनाव में हिस्सा लेने का निर्णय सुनाया और नवाज़ शरीफ़ से भी चुनाव में भाग लेने की अपील की.
नवाज़ की पार्टी के कुछ नेताओं ने देर रात बयान दिया है कि वे भी 8 जनवरी के चुनाव में हिस्सा लेंगे. ये और बात है कि पीएमएल क्यू और ख़ुद राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ शायद चुनाव को टालने का विचार रखते हों.
पता नहीं, सहारा समय का समय ख़राब चल रहा है या ख़बरों को इसी तरह से पेश कर वह ख़ुद को सबसे अलग साबित करना चाहता है.
आप भी पढ़ें ये ख़बरें......
अंग्रेज़ी साइटः-http://www.saharasamay.com/samayhtml/articles.aspx?newsid=91883
हिन्दी साइटः-
http://www.saharasamay.com/flash/hindi/#fullstory?id=110079
Thursday, December 27, 2007
कोई कह दे कि ये सच नहीं है...
कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी नेता के चले जाने की ख़बर पर यक़ीन नहीं होता. जी में आता है कि कोई कह दे कि ये सच नहीं हैं. आज एक बार फिर दिल ऐसी ही बातें कर रहा है.लेकिन कोई कहता भी नहीं है कि रावलपिंडी में 27 दिसंबर को जो हादसा हुआ, उसके हताहतों में बेनज़ीर भुट्टो नहीं हैं.

ऐसा इससे पहले राजीव गाँधी और प्रमोद महाजन के चले जाने पर महसूस हुआ था. लगता है कि मेरे बाप-दादा के घर के किसी पड़ोसी की हत्या हो गई है. लेकिन कड़वा सच यही है कि बेनज़ीर भुट्टो नहीं रहीं. मुशर्रफ़ के बयान आने तक मुझे भरोसा नहीं हो रहा था. चुनाव तैयारियों में आगे बढ़ रही बेनज़ीर के क़दम दरिंदों ने रावलपिंडी की एक सभा के बाद थाम लिए. लोकतंत्र की बहाली का जो काम बेनज़ीर अधूरा छोड़ गई हैं, वहां के लोग अग़र उसे पूरा नहीं कर पाए तो यह उस चमत्कारी नेता की शहादत का अपमान होगा.
वे हमारे बीच नहीं हैं. मैं तो अनुमान भी नहीं लगा सकता कि उस देश के लोगों पर क्या बीत रही होगी जिन्हें बेनज़ीर में अपना बेहतर भविष्य नज़र आ रहा था. राजीव जी, महाजन जी और बेनज़ीर जी को किसी न किसी हत्यारे ने हमसे छीना. तीनों कई तरह के विवादों में रहे लेकिन अपनी पीढ़ी के बीच उनका होना किसी सपने के पूरे होने की उम्मीद कायम रखता था. पाकिस्तान के लोगों से आतंकियों ने सिर्फ बेनज़ीर को नहीं छीना है बल्कि उनके बेहतर कल की उम्मीदें छीनी हैं. यह देश कल कैसा होगा, कैसे बढ़ेगा, इस पर क़यास लगाना फ़िजूल है क्योंकि मैंने सुना है कि वहां एक कहावत चल पड़ी है कि "देश का क्या होगा, यह सिर्फ अल्लाह को या मुशर्रफ को मालूम है."
भारत ने भी पड़ोस में एक ऐसा नेता खोया है जिसे वहां के दूसरे नेताओं से ज़्यादा भरोसा हासिल था. मेरी शत-शत श्रद्धांजलि....

ऐसा इससे पहले राजीव गाँधी और प्रमोद महाजन के चले जाने पर महसूस हुआ था. लगता है कि मेरे बाप-दादा के घर के किसी पड़ोसी की हत्या हो गई है. लेकिन कड़वा सच यही है कि बेनज़ीर भुट्टो नहीं रहीं. मुशर्रफ़ के बयान आने तक मुझे भरोसा नहीं हो रहा था. चुनाव तैयारियों में आगे बढ़ रही बेनज़ीर के क़दम दरिंदों ने रावलपिंडी की एक सभा के बाद थाम लिए. लोकतंत्र की बहाली का जो काम बेनज़ीर अधूरा छोड़ गई हैं, वहां के लोग अग़र उसे पूरा नहीं कर पाए तो यह उस चमत्कारी नेता की शहादत का अपमान होगा.
वे हमारे बीच नहीं हैं. मैं तो अनुमान भी नहीं लगा सकता कि उस देश के लोगों पर क्या बीत रही होगी जिन्हें बेनज़ीर में अपना बेहतर भविष्य नज़र आ रहा था. राजीव जी, महाजन जी और बेनज़ीर जी को किसी न किसी हत्यारे ने हमसे छीना. तीनों कई तरह के विवादों में रहे लेकिन अपनी पीढ़ी के बीच उनका होना किसी सपने के पूरे होने की उम्मीद कायम रखता था. पाकिस्तान के लोगों से आतंकियों ने सिर्फ बेनज़ीर को नहीं छीना है बल्कि उनके बेहतर कल की उम्मीदें छीनी हैं. यह देश कल कैसा होगा, कैसे बढ़ेगा, इस पर क़यास लगाना फ़िजूल है क्योंकि मैंने सुना है कि वहां एक कहावत चल पड़ी है कि "देश का क्या होगा, यह सिर्फ अल्लाह को या मुशर्रफ को मालूम है."
भारत ने भी पड़ोस में एक ऐसा नेता खोया है जिसे वहां के दूसरे नेताओं से ज़्यादा भरोसा हासिल था. मेरी शत-शत श्रद्धांजलि....
Tuesday, September 18, 2007
थेथरई की भी कोई लक्ष्मणरेखा होती है भला...!
आदरणीय श्री राजदीप सरदेसाई जी, श्री कमर वहीद नकवी जी और सम्मानित श्रीमती अनुराधा प्रसाद जी से व्यक्तिगत तौर पर क्षमा के साथ क्योंकि मेरी राय पूरी तौर पर व्यक्तिगत है और उनके संपूर्ण व्यक्तित्व के मात्र एक पहलू पर है। पत्रकारिता में उनका व्यापक योगदान है और उसका मैं भी बहुत सम्मान करता हूं.
कंटेंट कोड और आचार संहिता के बहस में पड़े बिना टीवी चैनलों को लेकर मेरी कुछ निजी राय है। सर्कस रिंग के बाहर के दर्शक को ताली और गाली दोनों का अधिकार है. मेरी राय को आप इस तरह भी ले सकते हैं. कोई परवाह करे, न करे, कहने या बकने के मेरे अधिकार से मुझे वंचित नहीं किया जा सकता. वैसे भी प्रेस वाले जिस संविधान का हवाला देकर जो जी में आए, दिखा और बता रहे हैं, और इस अधिकार को बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, वही संविधान सबसे पहले नागरिक को बोलने की आजादी देता है. दो-तीन दिन पहले दूरदर्शन पर देर रात टेलीविजन चैनलों के बड़े-बड़े बहसबाज इस बात पर रायशुमारी कर रहे थे कि कंटेंट कोड बन गया तो क्या-क्या हो जाएगा। कोई कह रहा था कि पहाड़ टूट पड़ेगा. किसी का मानना था कि प्रलय आ जाएगा.
इससे थोड़ी देर पहले ही उसी रात एनडीटीवी पर भी ऐसे ही कुछ दिग्गज लोग इस बात पर उलझ रहे थे कि आखिर दर्शक देखना क्या चाहता है. एनडीटीवी पर पंकज पचौरी जी बहस को संभाल रहे थे तो दूरदर्शन पर आलोक मेहता जी. दूरदर्शन वाली बहस में एनडीटीवी पर ऐसी ही बहस करवा चुके पचौरी साहब भी मौजूद थे. मुद्दे की बात यह है कि आलोक जी वाली बहस में राजदीप जी और अनुराधा जी और एनडीटीवी वाली बहस में नकवी जी ने जो बातें कही, उस पर मेरी गहरी और तीखी आपत्ति है। इन तीनों के कहे-सुने पर कुछ कहूं, इससे पहले प्रभु चावला जी के उस सवाल से अपनी सहमति और एकजुटता पेश करना चाहता हूं, जिसे आलोक जी ने अनसुना कर दिया.
चावला जी ने बस इतना कहा था कि सामाजिक जवाबदेही को लेकर जिस कंटेंट कोड की बात चल रही है, उसका पूरा लक्ष्य सिर्फ न्यूज के चैनल ही क्यों हों. इस भार को स्टार सरीखे उन चैनलों को भी उठाना चाहिए जो अपनी गल्पकथाओं में एक महिला की कई-कई शादियां करवा रहे हैं. लेकिन चूंकि ज्यादातर लोग समाचार चैनल से थे, इसलिए चावला जी की बात को आलोक जी ने आगे नहीं बढ़ाया या फिर बढ़ने नहीं दिया. इस बात की झल्लाहट चावला जी के चेहरे पर साफ तौर पर दिख रही थी लेकिन बहस में मौजूद अधिकांश लोग तो न्यूज चैनल पर तीर चलाने या चैनलों का पक्ष लेने के लिए तैयारी करके पहुंचे थे. और, यह बात भी टीवी चैनल वालों के नक्कारखाने में गुम हौ गई.
राजदीप जी की बात...
पटियाला में एक आदमी के आत्मदाह वाली खबर पर दर्शक दीर्घा से एक सवाल आया था कि क्या पत्रकार का काम यह नहीं था कि वह उस आदमी को जान देने से रोकता या आग लगा लेने के बाद कैमरा रखकर उसे बचाने की कोशिश करता। अलबत्ता, दर्शक का कहना था कि पत्रकार उसे उकसा रहे थे। राजदीप जी का कहना रहा कि पत्रकार पार्टी नहीं बनता है। वह सिर्फ और सिर्फ पत्रकार है. जो हो रहा है, बस उसे बताता और दिखाता है. खबर से आगे-पीछे उसकी कोई जवाबदेही नहीं बनती. अगर वह खबर को खबर के तौर पर देखने के बजाय किसी और नजरिए से देखने लगा तो खबर बन ही नहीं पाएगी. और, फिर दुनिया को यह पता नहीं चल पाएगा कि हालात कुछ ऐसे हो गए थे कि सरेआम खुदकुशी के अलावा पटियाला वाले के पास और कोई रास्ता नहीं बचा था.
मेरा कहना है कि...
दो-तीन दिन पहले ही एक स्टिंग ऑपरेशन को लेकर नोएडा के एक डॉक्टर साहब ने आईबीएन7 पर मुकदमा दर्च कराया है। मुकदमे में एक वादी होता है और दूसरा प्रतिवादी. आईबीएन7 प्रतिवादी बनाया गया है. माने राजदीप जी का चैनल मामले में एक पार्टी बन चुका है. आरोप है कि एक डॉक्टर के कहने पर चैनल ने साजिशन स्टिंग किया और इन डॉक्टर साहब को फंसाया. कहा जा रहा है कि कई तरह की विभागीय जांच में डॉक्टर साहब बरी हो गए हैं. अब राजदीप जी ये पत्रकार खबर दे रहे थे या खबर गढ़ रहे थे? इनकी गलती क्या लाइव इंडिया के उस फर्जी स्टिंग से किसी भी तरह से भी कमतर है जिसमें एक शिक्षिका पर अपने स्कूल की बच्चियों से धंधा करवाने का आरोग लगाया गया था. इस मामले में भी पत्रकार के द्वारा उमा खुराना जी के एक शत्रु के साथ मिलकर स्टिंग करने की बात सामने आ चुकी है.
राजदीप जी ने खुराना जी के मसले पर राय रखी कि ऐसी गलती उन चैनलों पर हो रही है, जिसके संपादक काम नहीं करते। अपने हिन्दी चैनल के संपादक के बारे में उनकी क्या राय है? डॉक्टर साहब तो यही कह रहे हैं कि उन्हें फंसाया गया है. इन दोनों मामले को परे रखकर भी बात करें तो समाचार चैनलों के पत्रकारों पर हाल के दिनों में खबर बनाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाने के आरोप लगे हैं. ऐसे पत्रकार हरेक मनोरंजन प्रधान समाचार चैनलों में मौजूद हैं. कभी ये पत्रकार किसी को गया में खुदकुशी के लिए उकसाते हैं तो कभी दूल्हे को लेकर उसकी दूसरी शादी करवाने चले जाते हैं. कभी पहली पत्नी को लेकर दूसरी शादी रचा रहे दूल्हे की मंडप पर पिटाई दिखाते हैं. पता नहीं, इन जांबाज और होनहार पत्रकारों को ऐसे मामलों की खबर कैसे लग जाती है. पुलिस नहीं पहुंचती लेकिन ये पहुंच जाते हैं. सोचना चाहिए कि ये पत्रकार कभी भी किसी आतंकी घटना या उसकी साजिश रचने की लाइव तस्वीरें क्यों नहीं जुटा पाते हैं.
जवाब साफ है कि इन्हें वहां बुलाया नहीं जाता. माने राजदीप जी की नजर में खुदकुशी की खबर का न्योता हो तो उसे चुपचाप स्वीकार कर लेना चाहिए और उसके मरने तक किसी को बताने की जरूरत महसूस नहीं करनी चाहिए. वर्ना दुनिया यह जान ही नहीं पाएगी कि सिस्टम से आजिज फलां ने फलां जगह पर जान दे दी. एक और बात, राजदीप जी कहते हैं कि हमें पार्टी नहीं बनना चाहिए। शायद उन्हें नहीं मालूम है लेकिन पूरा देश यह जानता है कि नरेंद्र मोदी, विहिप, बजरंग दल और शिवसेना को लेकर उनका नजरिया कहीं से भी वामपंथियों से कमजोर नहीं है. क्या आप यहां देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के सरोकार की वजह से पार्टी नहीं बनते हैं? और जब राजनीतिक मामलों में आप पार्टी बन सकते हैं तो एक निरीह की जान बचाने में पार्टी बनने से परहेज क्यों? देश में खबरों का इतना टोटा नहीं है कि किसी की खुदकुशी या किसी दूल्हे की पिटाई के बिना बुलेटिन तैयार न हो पाए.
अब बात नकवी साहब की...
नकवी साहब ने एनडीटीवी पर चली बहस में तीखे तेवर में कहा कि जिस कंटेंट कोड को लागू करने के लिए सरकार की तरफ से ब्रिटेन और बाकी देशों का उदाहरण दिया जा रहा है, भारत का लोकतंत्र वैसा नहीं है, इसलिए यहां रेगुलेटर को नहीं रखा जाना चाहिए।
मेरा कहना है कि....
बिल्कुल सही बात है कि भारतीय लोकतंत्र और उसके लोग ब्रिटेन जैसे नहीं हैं। लेकिन नकवी साहब को यह बताना चाहिए कि उस स्तर तक भारतीय लोकतंत्र कैसे पहुंच सकता है. नाग-नागिन, पुनर्जन्म, भूत दिखाकर वे क्या भारत के लोगों को उस ऊंचाई पर ले जा रहे हैं, जिस स्तर पर ब्रिटेन का लोकतंत्र है. उन्हें यह भी बताना चाहिए कि उनके चैनल ने लोगों को परिपक्वता के उस स्तर तक ले जाने के लिए क्या-क्या दिखाया है? क्रिकेट, कवरेज के भूखे कलाकार, नेताओं के भाषण, फर्जी चुनाव सर्वेक्षण के अलावा भारतीय लोकतंत्र को आप दे ही क्या रहे हैं, जो अपने बचाव में उसकी दुहाई देते रहते हैं. यह थोथी दलील भर है. जो चैनल राखी सावंत को पूरी तरह से स्क्रीन पर दिखाने के लिए अपने टिकर और स्क्रॉल हटा सकता है, वह और क्या-क्या कर सकता है या करता रहा है, इसके लिए किसी कोर्ट में बहस की जरूरत नहीं है।
मेरा तो यह मानना है कि नकवी जी और उनके जैसे बॉस चाहते हैं कि भारतीय लोगों की सोच-समझ का स्तर वहीं ठहरा रहे, जहां है. जहां तक हो सके उसे कुछ पीछे ले जाने की कोशिश की जाए. इसमें अर्थशास्त्र भी है. ऐसे कार्यक्रम तैयार करने पर काफी कम खर्च आता है. असली खबर दिखाने के लिए पत्रकार को फील्ड में जाना होगा, भटकना होगा और तब जाकर भी खबर बनेगी कि नहीं, गारंटी नहीं की जा सकती. लेकिन गल्पकथा पर बनी फिल्मों को देखने के आदी हो चुके भारतीय दर्शक गल्प समाचार को भी जरूर देखेंगे, यह टीआरपी से तय हो गया है.
एक कदम आगे बढ़ कर कहूं तो दर्शक स्क्रीन पर वह भी देखना चाहते हैं जिसे किसी भी परिवार में बाप-बेटा अलग-अलग कमरों में या एक-दूसरे से छुप कर देखता है. उदय शंकर जी पहले ही कह चुके हैं कि दर्शक जो देखेगा, हम दिखाएंगे. अगर कंटेंट कोड न बना तो सचमुच कोई न कोई यह दिखा ही देगा. छुपा-ढंक कर इंडिया टीवी ऐसे कार्यक्रम दिखाता ही रहा है.
और अंत में अनुराधा जी की बातें....
अनुराधा जी ने गौरव से कहा कि अगर टीवी चैनल होते तो आपातकाल नहीं लगाया जाता। चैनल वाले सरकार को बेनकाब कर देते।
मेरा कहना है कि....
अनुराधा जी की बातों से मैं सौ फीसदी सहमत हूं। अगर समाचार चैनल तभी आ गए होते तो न तो जेपी संपूर्ण क्रांति को जमीन पर उतार पाते और न ही आपातकाल की नौबत आती. तब चैनल वाले होते तो होता यह कि उस दशक में तेजी से उभरे अमिताभ बच्चन तभी महानायक बना दिए गए होते. क्रिकेट की दीवानगी अब तक सनक में बदल चुकी होती. और जिन बुरी आदतों से महानगरों के बच्चे आज गुजर रहे हैं, वे लक्षण गांव-गिरांव तक कब के पहुंच चुके होते. अभी तक तो उनकी कंपनी दूसरों के लिए कार्यक्रम बनाती थी.
अब वे खुद का चैनल ला रही हैं. इस लिहाज से उनकी सोच और नजरिए पर तो उनका चैनल शुरू होने से पहले कुछ नहीं कहा जा सकता. लेकिन, अगर उन्हें लगता है कि सबसे असरदार माध्यम टीवी की पत्रकारिता देश की सूरत संवार सकती है तो हम सबको उनके चैनल का भी इंतजार है. अनुराधा जी को भी मालूम है कि कालाहांडी भुखमरी से गुजर रहा है. उन गरीबों की जवाबदेही नवीन पटनायक जी के अलावा मनमोहन सिंह जी की भी है. यह उनके रनडाउन में होगा? मनमोहन जी की दो यात्राओं के दौरान विदर्भ में एक हजार से ज्यादा किसान खुदकुशी कर चुके हैं. क्या उनके चैनल पर ऐसे किसी किसान की आत्महत्या कहानी बनेगी? कोई इलाका पानी के लिए तरस रहा है, कहीं आज तक बिजली नहीं पहुंची है. कहीं अस्पतान नहीं है तो कहीं डॉक्टर जाते ही नहीं हैं. चुनौती आतंकवादियों के साथ-साथ नक्सलियों की भी है. खबर तो यह सब भी है.
मुझे इस बात का भी अंदाजा है कि ऐसे कार्यक्रम को पर्याप्त दर्शक नहीं मिलेंगे लेकिन टीआरपी की ज़ंग में वे यह साहस दिखा पाएंगी. यह सवाल इसलिए भी लाजिमी है क्योंकि उनका मुकाबला गंभीर और साहसी एनडी़टीवी, आक्रामक आईबीएन7, मध्यमार्गी आजतक और मनोरंजन प्रधान जी न्यूज, स्टार न्यूज, इंडिया टीवी से होगा. ज़ंग और प्यार में अगर नाजायज चीजें भी जायज होने लगें तो इससे देश की ज्यादातर आबादी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि टीवी वाले आपातकाल में क्यों नहीं थे. आप उस वक्त नहीं थे, इसलिए क्रांति हो सकी. नहीं तो वह आंदोलन भी रंगीन, हंसी और अच्छी-अच्छी खबरों के बीच दब गया होता. आप सारे आज एकजुट होकर यही तो कर रहे हैं...
कंटेंट कोड और आचार संहिता के बहस में पड़े बिना टीवी चैनलों को लेकर मेरी कुछ निजी राय है। सर्कस रिंग के बाहर के दर्शक को ताली और गाली दोनों का अधिकार है. मेरी राय को आप इस तरह भी ले सकते हैं. कोई परवाह करे, न करे, कहने या बकने के मेरे अधिकार से मुझे वंचित नहीं किया जा सकता. वैसे भी प्रेस वाले जिस संविधान का हवाला देकर जो जी में आए, दिखा और बता रहे हैं, और इस अधिकार को बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, वही संविधान सबसे पहले नागरिक को बोलने की आजादी देता है. दो-तीन दिन पहले दूरदर्शन पर देर रात टेलीविजन चैनलों के बड़े-बड़े बहसबाज इस बात पर रायशुमारी कर रहे थे कि कंटेंट कोड बन गया तो क्या-क्या हो जाएगा। कोई कह रहा था कि पहाड़ टूट पड़ेगा. किसी का मानना था कि प्रलय आ जाएगा.
इससे थोड़ी देर पहले ही उसी रात एनडीटीवी पर भी ऐसे ही कुछ दिग्गज लोग इस बात पर उलझ रहे थे कि आखिर दर्शक देखना क्या चाहता है. एनडीटीवी पर पंकज पचौरी जी बहस को संभाल रहे थे तो दूरदर्शन पर आलोक मेहता जी. दूरदर्शन वाली बहस में एनडीटीवी पर ऐसी ही बहस करवा चुके पचौरी साहब भी मौजूद थे. मुद्दे की बात यह है कि आलोक जी वाली बहस में राजदीप जी और अनुराधा जी और एनडीटीवी वाली बहस में नकवी जी ने जो बातें कही, उस पर मेरी गहरी और तीखी आपत्ति है। इन तीनों के कहे-सुने पर कुछ कहूं, इससे पहले प्रभु चावला जी के उस सवाल से अपनी सहमति और एकजुटता पेश करना चाहता हूं, जिसे आलोक जी ने अनसुना कर दिया.
चावला जी ने बस इतना कहा था कि सामाजिक जवाबदेही को लेकर जिस कंटेंट कोड की बात चल रही है, उसका पूरा लक्ष्य सिर्फ न्यूज के चैनल ही क्यों हों. इस भार को स्टार सरीखे उन चैनलों को भी उठाना चाहिए जो अपनी गल्पकथाओं में एक महिला की कई-कई शादियां करवा रहे हैं. लेकिन चूंकि ज्यादातर लोग समाचार चैनल से थे, इसलिए चावला जी की बात को आलोक जी ने आगे नहीं बढ़ाया या फिर बढ़ने नहीं दिया. इस बात की झल्लाहट चावला जी के चेहरे पर साफ तौर पर दिख रही थी लेकिन बहस में मौजूद अधिकांश लोग तो न्यूज चैनल पर तीर चलाने या चैनलों का पक्ष लेने के लिए तैयारी करके पहुंचे थे. और, यह बात भी टीवी चैनल वालों के नक्कारखाने में गुम हौ गई.
राजदीप जी की बात...
पटियाला में एक आदमी के आत्मदाह वाली खबर पर दर्शक दीर्घा से एक सवाल आया था कि क्या पत्रकार का काम यह नहीं था कि वह उस आदमी को जान देने से रोकता या आग लगा लेने के बाद कैमरा रखकर उसे बचाने की कोशिश करता। अलबत्ता, दर्शक का कहना था कि पत्रकार उसे उकसा रहे थे। राजदीप जी का कहना रहा कि पत्रकार पार्टी नहीं बनता है। वह सिर्फ और सिर्फ पत्रकार है. जो हो रहा है, बस उसे बताता और दिखाता है. खबर से आगे-पीछे उसकी कोई जवाबदेही नहीं बनती. अगर वह खबर को खबर के तौर पर देखने के बजाय किसी और नजरिए से देखने लगा तो खबर बन ही नहीं पाएगी. और, फिर दुनिया को यह पता नहीं चल पाएगा कि हालात कुछ ऐसे हो गए थे कि सरेआम खुदकुशी के अलावा पटियाला वाले के पास और कोई रास्ता नहीं बचा था.
मेरा कहना है कि...
दो-तीन दिन पहले ही एक स्टिंग ऑपरेशन को लेकर नोएडा के एक डॉक्टर साहब ने आईबीएन7 पर मुकदमा दर्च कराया है। मुकदमे में एक वादी होता है और दूसरा प्रतिवादी. आईबीएन7 प्रतिवादी बनाया गया है. माने राजदीप जी का चैनल मामले में एक पार्टी बन चुका है. आरोप है कि एक डॉक्टर के कहने पर चैनल ने साजिशन स्टिंग किया और इन डॉक्टर साहब को फंसाया. कहा जा रहा है कि कई तरह की विभागीय जांच में डॉक्टर साहब बरी हो गए हैं. अब राजदीप जी ये पत्रकार खबर दे रहे थे या खबर गढ़ रहे थे? इनकी गलती क्या लाइव इंडिया के उस फर्जी स्टिंग से किसी भी तरह से भी कमतर है जिसमें एक शिक्षिका पर अपने स्कूल की बच्चियों से धंधा करवाने का आरोग लगाया गया था. इस मामले में भी पत्रकार के द्वारा उमा खुराना जी के एक शत्रु के साथ मिलकर स्टिंग करने की बात सामने आ चुकी है.
राजदीप जी ने खुराना जी के मसले पर राय रखी कि ऐसी गलती उन चैनलों पर हो रही है, जिसके संपादक काम नहीं करते। अपने हिन्दी चैनल के संपादक के बारे में उनकी क्या राय है? डॉक्टर साहब तो यही कह रहे हैं कि उन्हें फंसाया गया है. इन दोनों मामले को परे रखकर भी बात करें तो समाचार चैनलों के पत्रकारों पर हाल के दिनों में खबर बनाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाने के आरोप लगे हैं. ऐसे पत्रकार हरेक मनोरंजन प्रधान समाचार चैनलों में मौजूद हैं. कभी ये पत्रकार किसी को गया में खुदकुशी के लिए उकसाते हैं तो कभी दूल्हे को लेकर उसकी दूसरी शादी करवाने चले जाते हैं. कभी पहली पत्नी को लेकर दूसरी शादी रचा रहे दूल्हे की मंडप पर पिटाई दिखाते हैं. पता नहीं, इन जांबाज और होनहार पत्रकारों को ऐसे मामलों की खबर कैसे लग जाती है. पुलिस नहीं पहुंचती लेकिन ये पहुंच जाते हैं. सोचना चाहिए कि ये पत्रकार कभी भी किसी आतंकी घटना या उसकी साजिश रचने की लाइव तस्वीरें क्यों नहीं जुटा पाते हैं.
जवाब साफ है कि इन्हें वहां बुलाया नहीं जाता. माने राजदीप जी की नजर में खुदकुशी की खबर का न्योता हो तो उसे चुपचाप स्वीकार कर लेना चाहिए और उसके मरने तक किसी को बताने की जरूरत महसूस नहीं करनी चाहिए. वर्ना दुनिया यह जान ही नहीं पाएगी कि सिस्टम से आजिज फलां ने फलां जगह पर जान दे दी. एक और बात, राजदीप जी कहते हैं कि हमें पार्टी नहीं बनना चाहिए। शायद उन्हें नहीं मालूम है लेकिन पूरा देश यह जानता है कि नरेंद्र मोदी, विहिप, बजरंग दल और शिवसेना को लेकर उनका नजरिया कहीं से भी वामपंथियों से कमजोर नहीं है. क्या आप यहां देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के सरोकार की वजह से पार्टी नहीं बनते हैं? और जब राजनीतिक मामलों में आप पार्टी बन सकते हैं तो एक निरीह की जान बचाने में पार्टी बनने से परहेज क्यों? देश में खबरों का इतना टोटा नहीं है कि किसी की खुदकुशी या किसी दूल्हे की पिटाई के बिना बुलेटिन तैयार न हो पाए.
अब बात नकवी साहब की...
नकवी साहब ने एनडीटीवी पर चली बहस में तीखे तेवर में कहा कि जिस कंटेंट कोड को लागू करने के लिए सरकार की तरफ से ब्रिटेन और बाकी देशों का उदाहरण दिया जा रहा है, भारत का लोकतंत्र वैसा नहीं है, इसलिए यहां रेगुलेटर को नहीं रखा जाना चाहिए।
मेरा कहना है कि....
बिल्कुल सही बात है कि भारतीय लोकतंत्र और उसके लोग ब्रिटेन जैसे नहीं हैं। लेकिन नकवी साहब को यह बताना चाहिए कि उस स्तर तक भारतीय लोकतंत्र कैसे पहुंच सकता है. नाग-नागिन, पुनर्जन्म, भूत दिखाकर वे क्या भारत के लोगों को उस ऊंचाई पर ले जा रहे हैं, जिस स्तर पर ब्रिटेन का लोकतंत्र है. उन्हें यह भी बताना चाहिए कि उनके चैनल ने लोगों को परिपक्वता के उस स्तर तक ले जाने के लिए क्या-क्या दिखाया है? क्रिकेट, कवरेज के भूखे कलाकार, नेताओं के भाषण, फर्जी चुनाव सर्वेक्षण के अलावा भारतीय लोकतंत्र को आप दे ही क्या रहे हैं, जो अपने बचाव में उसकी दुहाई देते रहते हैं. यह थोथी दलील भर है. जो चैनल राखी सावंत को पूरी तरह से स्क्रीन पर दिखाने के लिए अपने टिकर और स्क्रॉल हटा सकता है, वह और क्या-क्या कर सकता है या करता रहा है, इसके लिए किसी कोर्ट में बहस की जरूरत नहीं है।
मेरा तो यह मानना है कि नकवी जी और उनके जैसे बॉस चाहते हैं कि भारतीय लोगों की सोच-समझ का स्तर वहीं ठहरा रहे, जहां है. जहां तक हो सके उसे कुछ पीछे ले जाने की कोशिश की जाए. इसमें अर्थशास्त्र भी है. ऐसे कार्यक्रम तैयार करने पर काफी कम खर्च आता है. असली खबर दिखाने के लिए पत्रकार को फील्ड में जाना होगा, भटकना होगा और तब जाकर भी खबर बनेगी कि नहीं, गारंटी नहीं की जा सकती. लेकिन गल्पकथा पर बनी फिल्मों को देखने के आदी हो चुके भारतीय दर्शक गल्प समाचार को भी जरूर देखेंगे, यह टीआरपी से तय हो गया है.
एक कदम आगे बढ़ कर कहूं तो दर्शक स्क्रीन पर वह भी देखना चाहते हैं जिसे किसी भी परिवार में बाप-बेटा अलग-अलग कमरों में या एक-दूसरे से छुप कर देखता है. उदय शंकर जी पहले ही कह चुके हैं कि दर्शक जो देखेगा, हम दिखाएंगे. अगर कंटेंट कोड न बना तो सचमुच कोई न कोई यह दिखा ही देगा. छुपा-ढंक कर इंडिया टीवी ऐसे कार्यक्रम दिखाता ही रहा है.
और अंत में अनुराधा जी की बातें....
अनुराधा जी ने गौरव से कहा कि अगर टीवी चैनल होते तो आपातकाल नहीं लगाया जाता। चैनल वाले सरकार को बेनकाब कर देते।
मेरा कहना है कि....
अनुराधा जी की बातों से मैं सौ फीसदी सहमत हूं। अगर समाचार चैनल तभी आ गए होते तो न तो जेपी संपूर्ण क्रांति को जमीन पर उतार पाते और न ही आपातकाल की नौबत आती. तब चैनल वाले होते तो होता यह कि उस दशक में तेजी से उभरे अमिताभ बच्चन तभी महानायक बना दिए गए होते. क्रिकेट की दीवानगी अब तक सनक में बदल चुकी होती. और जिन बुरी आदतों से महानगरों के बच्चे आज गुजर रहे हैं, वे लक्षण गांव-गिरांव तक कब के पहुंच चुके होते. अभी तक तो उनकी कंपनी दूसरों के लिए कार्यक्रम बनाती थी.
अब वे खुद का चैनल ला रही हैं. इस लिहाज से उनकी सोच और नजरिए पर तो उनका चैनल शुरू होने से पहले कुछ नहीं कहा जा सकता. लेकिन, अगर उन्हें लगता है कि सबसे असरदार माध्यम टीवी की पत्रकारिता देश की सूरत संवार सकती है तो हम सबको उनके चैनल का भी इंतजार है. अनुराधा जी को भी मालूम है कि कालाहांडी भुखमरी से गुजर रहा है. उन गरीबों की जवाबदेही नवीन पटनायक जी के अलावा मनमोहन सिंह जी की भी है. यह उनके रनडाउन में होगा? मनमोहन जी की दो यात्राओं के दौरान विदर्भ में एक हजार से ज्यादा किसान खुदकुशी कर चुके हैं. क्या उनके चैनल पर ऐसे किसी किसान की आत्महत्या कहानी बनेगी? कोई इलाका पानी के लिए तरस रहा है, कहीं आज तक बिजली नहीं पहुंची है. कहीं अस्पतान नहीं है तो कहीं डॉक्टर जाते ही नहीं हैं. चुनौती आतंकवादियों के साथ-साथ नक्सलियों की भी है. खबर तो यह सब भी है.
मुझे इस बात का भी अंदाजा है कि ऐसे कार्यक्रम को पर्याप्त दर्शक नहीं मिलेंगे लेकिन टीआरपी की ज़ंग में वे यह साहस दिखा पाएंगी. यह सवाल इसलिए भी लाजिमी है क्योंकि उनका मुकाबला गंभीर और साहसी एनडी़टीवी, आक्रामक आईबीएन7, मध्यमार्गी आजतक और मनोरंजन प्रधान जी न्यूज, स्टार न्यूज, इंडिया टीवी से होगा. ज़ंग और प्यार में अगर नाजायज चीजें भी जायज होने लगें तो इससे देश की ज्यादातर आबादी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि टीवी वाले आपातकाल में क्यों नहीं थे. आप उस वक्त नहीं थे, इसलिए क्रांति हो सकी. नहीं तो वह आंदोलन भी रंगीन, हंसी और अच्छी-अच्छी खबरों के बीच दब गया होता. आप सारे आज एकजुट होकर यही तो कर रहे हैं...
Thursday, August 2, 2007
क्रिकेटः देश के विकास की राह में रोड़ा
आप कहेंगे कि ये लड़का कुछ पगला गया सा लगता है. इस देश के क्रिकेटभक्त इस जुर्म के लिए मुझे लालकिले पर फांसी
भी दे सकते हैं। फांसी पर झूलने के लिए मैं भी गला साफ करके तैयार हूं लेकिन मेरी अंतिम ख्वाहिश है कि मेरी बात सुन ली जाए. क्रिकेट के खिलाफ बात पूरी नहीं करने दी जाती, ये भी कोई कम सजा है.
देश की सौ करोड़ से ज्यादा की आबादी में यूं ही बेरोजगारों की बड़ी फौज है। बचीखुची कामकाजू आबादी पर क्रिकेट का भूत किस कदर सवार है, इसका आलम उस दिन नजर आता है जब ऐन मौके पर दुनिया की सबसे बड़ी निकम्मी टीम साबित हो जाने वाली भारतीय टीम के मॉडल कहें या खिलाड़ी, किसी के खिलाफ मैदान में उतरते हैं.
देश के विकास में क्रिकेट का कितना योगदान है और कितनी संभावनाएं बची हुई हैं, ये शोध का विषय हो सकता है। लेकिन, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि जिस दिन कोई क्रिकेट मैच हो, सरकारी दफ्तरों, यहां तक कि कॉरपोरेट ऑफिसों में भी काम की रफ्तार बेकार हो जाती है. इंदिरा आवास का आवेदन लेकर कोई बेघर बीडीओ साहब के दफ्तर पहुंचा होता है और साहब घर पर मैच का मजा उठा रहे होते हैं. किरानी, चपरासी और बड़ा बाबू भी रेडियो से चिपके नजर आते हैं. ऐसा ही नजारा दूसरे दफ्तरों में भी दिखता है. सड़क किनारे वैसी दुकानों पर मजमा ही लग जाता है, जहां कोई टीवी मैच दिखा रहा हो. देश के हर आदमी को मनोरंजन का अधिकार है लेकिन आम लोगों के काम को टालकर अगर मैच देखा जाए तो इस पर मुझे गहरी आपत्ति है. और, अगर आपको इस तरह के काम से परेशानी नहीं होती तो मेरी नजर में आप देशद्रोही जैसे ही हैं. मेरा तो यह भी मानना है कि पाकिस्तान जाली नोट भेजकर हमारी अर्थव्यवस्था को जितना नुकसान नहीं पहुंचा पाता है, उससे ज्यादा नुकसान श्रम दिवस की क्षति के लिहाज से क्रिकेट का मैच पहुंचाता है. ये अंग्रेज तो चले गए लेकिन कभी अपने गुलाम रहे भारत और हमारे पड़ोसी देशों (तब अविभाजित) को कुछ ऐसे रोग देकर गए जो उनसे आगे निकलने में हमारा रास्ता रोक लेते हैं. हम सोचते हैं कि सचिन के छक्के ब्रितानी सिपाहियों की गोलियों का जवाब है.
मेरी राय में क्रिकेट ऐसे लोगों का खेल है, जिनके पास पर्याप्त पैसा और उससे भी ज्यादा फालतू समय हो। भई, अब 100 ओवर का खेल देखने या खेलने के लिए दस घंटे का खाली समय भी तो चाहिए. और, भारत जैसे गरीब देश के कुछ करोड़ कामगारों को अगर एक ऐसे खेल को देखने, सुनने, खाने, पीने, गाने, नहाने... की लत लगती जा रही है तो यह आत्मघाती ही है. साल भर में ये खिलाड़ी कम से कम कुल मिलाकर दो महीना कहीं न कहीं खेलते रहते हैं. ये अलग बात है कि इनकी खबरें सालों भर छपती रहती है. मैच न हो तो खिलाड़ियों की निजी जिंदगी ही सही. इस लिहाज से सालाना तौर पर देखें तो करीब साठ दिन भारतीय कामगारों की कार्यक्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पाता है. इनमें से कई करोड़ श्रमिक मैच के दिन अपने काम को न्यूनतम उत्पादन स्तर पर पहुंचा देते हैं. गरीबी से जूझ रहे एक देश के लिए श्रम दिवस का इससे बड़ा अपव्यय कुछ और नहीं हो सकता.
पता नहीं, अपने देश में फुटबॉल और हॉकी की ऐसी दुर्गति क्यों है? खेल उत्पादों का बाजार और मीडिया के अंदर प्रचार के पैसे का लोभ भी इसकी एक वजह नजर आती है। फुटबॉल या हॉकी खेलने के लिए कम से कम एक लंबा-चौड़ा मैदान चाहिए होता है. क्रिकेट तो गली-नुक्कड़ों के साथ ही साथ बंद या हड़ताल के दौरान किसी राजमार्ग पर भी खेला जा सकता है. तो देश में ऐसे खेल को लेकर सनक पैदा करने का क्या फायदा, जिसे खेलने वाले ही कम पड़ जाएं. क्रिकेट की सनक ने सड़क-गली-नुक्कड़ तक में दस-दस टीम बनवा दिया है. इतनी टीमों को खेलने के लिए लाखों बल्ले, गेंद, और भी न जानें किन-किन चीजों की जरूरत पड़ती है.
एक खेल में उपकरण और सामान का इतना बड़ा बाजार बन जाता है कि सिर्फ जर्सी, बूट, नेट और बॉल या स्टिक व गेंद वाले खेल फुटबॉल और हॉकी को भारत के बड़े बाजार ने बेगाना सा बना दिया है. खेल संघों पर काबिज नेताओं की करतूतें भी मजेदार ही है. मीडिया वाले बाजार के हाथों खेलते भी हैं और सीना ठोंककर कहते हैं कि लोग यही देखना चाहते हैं. क्रिकेट के व्यापारी दर्शकों को बांधे रखने के लिए रोज नए-नए प्रयोग कर रहे हैं. ट्वेंटी-ट्वेंटी नया अस्त्र है. यूरोप के खेलप्रेमियों का शौक उम्दा है. वे क्रिकेट देखते हैं लेकिन फुटबॉल या दूसरे खेलों की कीमत पर नहीं. विकसित और संपन्न देशों में भी फुटबॉल के खिलाड़ियों की कमाई या लोकप्रियता हमारे या उनके देश के किसी भी सफलतम क्रिकेट खिलाड़ी की जादू पर बहुत भारी है. कहा भी गया है, घर की मुर्गी दाल बराबर. हम भारतीय हिन्दी भाषा की तरह ही देश के अन्य खेलों का सत्यानाश कर रहे हैं. एक फिल्म है, चक दे इंडिया. हॉकी के भारतीय जीवन को इस फिल्म से कुछ सांसें और कुछ ताकत मिल जाए, तो यशराज फिल्मस के यश में भी वृद्धि हो. शाहरूख को मेरी शुभकामना है. सौ फूलों का खिलना देश के लिए, खिलाड़ियों के लिए और दर्शकों के लिए भी बेहतर होगा. रोजगार के मौके बढ़ेंगे. खेलप्रेमियों के सामने दर्शन का विकल्प भी...
भी दे सकते हैं। फांसी पर झूलने के लिए मैं भी गला साफ करके तैयार हूं लेकिन मेरी अंतिम ख्वाहिश है कि मेरी बात सुन ली जाए. क्रिकेट के खिलाफ बात पूरी नहीं करने दी जाती, ये भी कोई कम सजा है.देश की सौ करोड़ से ज्यादा की आबादी में यूं ही बेरोजगारों की बड़ी फौज है। बचीखुची कामकाजू आबादी पर क्रिकेट का भूत किस कदर सवार है, इसका आलम उस दिन नजर आता है जब ऐन मौके पर दुनिया की सबसे बड़ी निकम्मी टीम साबित हो जाने वाली भारतीय टीम के मॉडल कहें या खिलाड़ी, किसी के खिलाफ मैदान में उतरते हैं.
देश के विकास में क्रिकेट का कितना योगदान है और कितनी संभावनाएं बची हुई हैं, ये शोध का विषय हो सकता है। लेकिन, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि जिस दिन कोई क्रिकेट मैच हो, सरकारी दफ्तरों, यहां तक कि कॉरपोरेट ऑफिसों में भी काम की रफ्तार बेकार हो जाती है. इंदिरा आवास का आवेदन लेकर कोई बेघर बीडीओ साहब के दफ्तर पहुंचा होता है और साहब घर पर मैच का मजा उठा रहे होते हैं. किरानी, चपरासी और बड़ा बाबू भी रेडियो से चिपके नजर आते हैं. ऐसा ही नजारा दूसरे दफ्तरों में भी दिखता है. सड़क किनारे वैसी दुकानों पर मजमा ही लग जाता है, जहां कोई टीवी मैच दिखा रहा हो. देश के हर आदमी को मनोरंजन का अधिकार है लेकिन आम लोगों के काम को टालकर अगर मैच देखा जाए तो इस पर मुझे गहरी आपत्ति है. और, अगर आपको इस तरह के काम से परेशानी नहीं होती तो मेरी नजर में आप देशद्रोही जैसे ही हैं. मेरा तो यह भी मानना है कि पाकिस्तान जाली नोट भेजकर हमारी अर्थव्यवस्था को जितना नुकसान नहीं पहुंचा पाता है, उससे ज्यादा नुकसान श्रम दिवस की क्षति के लिहाज से क्रिकेट का मैच पहुंचाता है. ये अंग्रेज तो चले गए लेकिन कभी अपने गुलाम रहे भारत और हमारे पड़ोसी देशों (तब अविभाजित) को कुछ ऐसे रोग देकर गए जो उनसे आगे निकलने में हमारा रास्ता रोक लेते हैं. हम सोचते हैं कि सचिन के छक्के ब्रितानी सिपाहियों की गोलियों का जवाब है.
मेरी राय में क्रिकेट ऐसे लोगों का खेल है, जिनके पास पर्याप्त पैसा और उससे भी ज्यादा फालतू समय हो। भई, अब 100 ओवर का खेल देखने या खेलने के लिए दस घंटे का खाली समय भी तो चाहिए. और, भारत जैसे गरीब देश के कुछ करोड़ कामगारों को अगर एक ऐसे खेल को देखने, सुनने, खाने, पीने, गाने, नहाने... की लत लगती जा रही है तो यह आत्मघाती ही है. साल भर में ये खिलाड़ी कम से कम कुल मिलाकर दो महीना कहीं न कहीं खेलते रहते हैं. ये अलग बात है कि इनकी खबरें सालों भर छपती रहती है. मैच न हो तो खिलाड़ियों की निजी जिंदगी ही सही. इस लिहाज से सालाना तौर पर देखें तो करीब साठ दिन भारतीय कामगारों की कार्यक्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पाता है. इनमें से कई करोड़ श्रमिक मैच के दिन अपने काम को न्यूनतम उत्पादन स्तर पर पहुंचा देते हैं. गरीबी से जूझ रहे एक देश के लिए श्रम दिवस का इससे बड़ा अपव्यय कुछ और नहीं हो सकता.
पता नहीं, अपने देश में फुटबॉल और हॉकी की ऐसी दुर्गति क्यों है? खेल उत्पादों का बाजार और मीडिया के अंदर प्रचार के पैसे का लोभ भी इसकी एक वजह नजर आती है। फुटबॉल या हॉकी खेलने के लिए कम से कम एक लंबा-चौड़ा मैदान चाहिए होता है. क्रिकेट तो गली-नुक्कड़ों के साथ ही साथ बंद या हड़ताल के दौरान किसी राजमार्ग पर भी खेला जा सकता है. तो देश में ऐसे खेल को लेकर सनक पैदा करने का क्या फायदा, जिसे खेलने वाले ही कम पड़ जाएं. क्रिकेट की सनक ने सड़क-गली-नुक्कड़ तक में दस-दस टीम बनवा दिया है. इतनी टीमों को खेलने के लिए लाखों बल्ले, गेंद, और भी न जानें किन-किन चीजों की जरूरत पड़ती है.
एक खेल में उपकरण और सामान का इतना बड़ा बाजार बन जाता है कि सिर्फ जर्सी, बूट, नेट और बॉल या स्टिक व गेंद वाले खेल फुटबॉल और हॉकी को भारत के बड़े बाजार ने बेगाना सा बना दिया है. खेल संघों पर काबिज नेताओं की करतूतें भी मजेदार ही है. मीडिया वाले बाजार के हाथों खेलते भी हैं और सीना ठोंककर कहते हैं कि लोग यही देखना चाहते हैं. क्रिकेट के व्यापारी दर्शकों को बांधे रखने के लिए रोज नए-नए प्रयोग कर रहे हैं. ट्वेंटी-ट्वेंटी नया अस्त्र है. यूरोप के खेलप्रेमियों का शौक उम्दा है. वे क्रिकेट देखते हैं लेकिन फुटबॉल या दूसरे खेलों की कीमत पर नहीं. विकसित और संपन्न देशों में भी फुटबॉल के खिलाड़ियों की कमाई या लोकप्रियता हमारे या उनके देश के किसी भी सफलतम क्रिकेट खिलाड़ी की जादू पर बहुत भारी है. कहा भी गया है, घर की मुर्गी दाल बराबर. हम भारतीय हिन्दी भाषा की तरह ही देश के अन्य खेलों का सत्यानाश कर रहे हैं. एक फिल्म है, चक दे इंडिया. हॉकी के भारतीय जीवन को इस फिल्म से कुछ सांसें और कुछ ताकत मिल जाए, तो यशराज फिल्मस के यश में भी वृद्धि हो. शाहरूख को मेरी शुभकामना है. सौ फूलों का खिलना देश के लिए, खिलाड़ियों के लिए और दर्शकों के लिए भी बेहतर होगा. रोजगार के मौके बढ़ेंगे. खेलप्रेमियों के सामने दर्शन का विकल्प भी...
Tuesday, July 24, 2007
लगता नहीं कि दिल्ली में कोई विपक्षी पार्टी भी है...
दिल्ली में भाजपा या बसपा जैसी विपक्षी पार्टियां आजकल क्या कर रहीं हैं, जब पूरी की पूरी दिल्ली बस की कमी को लेकर तंग-तंग है। यह सवाल अकेले मेरे मन में नहीं कौंध रहा. निम्नमध्यमवर्गीय
परिवार का मुझ जैसा हर आदमी और मध्यमवर्गीय परिवार के सामान्य लोग भी इस सवाल का जवाब राजनाथ सिंह और हर्षवर्धन की आंखों में तलाशने की कोशिश कर रहे हैं. पर उनकी आंखें हैं कि उसमें पानी नहीं रह गया है. गरीब लोगों की चर्चा चुनाव के वक्त ही शोभा देती है नहीं तो फुटपाथ पर रातें गुजारने वालों को रौंदने वाली चमचमाती कारों पर चढ़ने वाले नेता, सोशलाइट और नवधनाढ्य मेरी जैसी राय रखने वालों को विकास विरोधी करार दे देंगे. और तो और कोर्ट मुझे भी बिन बुलाया मेहमान ठहरा देगा.
अभी तो नगर निगम के चुनाव में इसी आबादी ने भाजपा को जीत का तोहफा दिया था। लगता है, आरती मेहरा भी ये भूल गईं हैं. अगर उनके वोटरों के पास आने-जाने के साधनों की कमी पैदा हो गई है तो नाला-सड़क से ऊपर उठने की जरूरत उन्हें भी महसूस होनी चाहिए. वे बसें चला या चलवा नहीं सकती लेकिन राज्य सरकार पर बतौर राजनीतिक कार्यकर्ता दबाव तो बना ही सकती हैं. लेकिन जब उनकी पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं ने ही चुप्पी साध रखी है तो वे बेचारी खुद के लिए मुसीबत को क्यों न्योता दें. मेहरा को मेयर बने अभी तो जुम्मा-जुम्मा चार दिन ही हुए हैं.
दिल्ली की राजनीति में वामपंथियों की कोई खास पूछ नहीं है। फुर्सत के समय में इनके कार्यकर्ता पूंजीपतियों की, पूंजीपतियों के लिए और पूंजीपतियों के द्वारा चलाए जा रहे देश के प्रमुख दलों और उसके नेताओं के कारोबार-व्यापार पर नजर रखते हैं. इसमें ठेका-पट्टा से लेकर रियायत देने तक की गतिविधियां शामिल हैं. ऐसे ही एक कॉमरेड से मंगलवार को आईटीओ पर भेंट हो गई. कुछ दिन पहले तक मेरे ये मित्र दिल्ली में अपनी पार्टी की छात्र इकाई के नेता हुआ करते थे. छात्र राजनीति के दिनों में इस मित्र ने डीयू में पैसे की ताकत पर कांग्रेसी एनएसयूआई और भाजपाई विद्यार्थी परिषद के लहराते झंडे देखे हैं. वैसे तो हमदोनों के पास फटफटिया है लेकिन फिर भी वामपंथी आदतों से मजबूर होने की वजह से जल्दी ही हमारी बातचीत दिल्ली में बसों के संकट पर अटक गई. सर पर मंडरा रहे विधानसभा चुनाव और हाल ही में निगम चुनाव की करारी हार के बावजूद शीला दीक्षित की बेवकूफी ( वैकल्पिक उपायों पर गौर किए बगैर मीडिया के दबाव में ब्लूलाइन बसों को रातोंरात सुधारने के मकसद से उठाए गए कदमों की वजह से ) पर मैं हंस ही रहा था कि मेरे कॉमरेड मित्र ने भाजपा को मामले में लपेट लिया.
कॉमरेड मित्र बता रहे थे कि छोटी-छोटी बात पर सड़क जाम करने, पुतला जलाने और धरना-प्रदर्शन करने वाली भाजपा इस मसले पर दिल्ली की बेबस जनता के दुख में हमकदम होगी, इसमें शक है. मेरा स्वाभाविक सवाल था, क्यों? मित्र ने बताया, दिल्ली की ज्यादातर ब्लूलाइन बसों के मालिक भाजपा के नेता हैं, और कुछ नहीं तो कार्यकर्ता तो हैं ही. भाजपा के नेता अपनी बसों को चलवाने के लिए परेशान है क्योंकि सरकार बार-बार इन बसों को चलता करने की धमकी दे रही है. बस मालिक नेता और उनकी पार्टी सरकार के मिजाज को देखते हुए कोई खतरा उठाने को तैयार नहीं दिख रही है. वे अपेक्षित चुप्पी और औपचारिक बयान के साथ जनता की ओर देख रहे हैं. दिल्ली के बस पीड़ित अभी दुधारी तलवार की तरह हैं. वो अपने कष्ट की सजा संकट पैदा करने वाली सरकार को देंगे या खामोश विपक्ष को, इस नतीजे का इंतजार मुझे जरूर रहेगा. कम से कम यह तो पता चल ही जाएगा कि दिल्ली में सिर्फ सरकार और नेता ही संवेदनहीन हैं या यहां रहने वाले लोग भी भोथरे हो चले हैं.
परिवार का मुझ जैसा हर आदमी और मध्यमवर्गीय परिवार के सामान्य लोग भी इस सवाल का जवाब राजनाथ सिंह और हर्षवर्धन की आंखों में तलाशने की कोशिश कर रहे हैं. पर उनकी आंखें हैं कि उसमें पानी नहीं रह गया है. गरीब लोगों की चर्चा चुनाव के वक्त ही शोभा देती है नहीं तो फुटपाथ पर रातें गुजारने वालों को रौंदने वाली चमचमाती कारों पर चढ़ने वाले नेता, सोशलाइट और नवधनाढ्य मेरी जैसी राय रखने वालों को विकास विरोधी करार दे देंगे. और तो और कोर्ट मुझे भी बिन बुलाया मेहमान ठहरा देगा.अभी तो नगर निगम के चुनाव में इसी आबादी ने भाजपा को जीत का तोहफा दिया था। लगता है, आरती मेहरा भी ये भूल गईं हैं. अगर उनके वोटरों के पास आने-जाने के साधनों की कमी पैदा हो गई है तो नाला-सड़क से ऊपर उठने की जरूरत उन्हें भी महसूस होनी चाहिए. वे बसें चला या चलवा नहीं सकती लेकिन राज्य सरकार पर बतौर राजनीतिक कार्यकर्ता दबाव तो बना ही सकती हैं. लेकिन जब उनकी पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं ने ही चुप्पी साध रखी है तो वे बेचारी खुद के लिए मुसीबत को क्यों न्योता दें. मेहरा को मेयर बने अभी तो जुम्मा-जुम्मा चार दिन ही हुए हैं.
दिल्ली की राजनीति में वामपंथियों की कोई खास पूछ नहीं है। फुर्सत के समय में इनके कार्यकर्ता पूंजीपतियों की, पूंजीपतियों के लिए और पूंजीपतियों के द्वारा चलाए जा रहे देश के प्रमुख दलों और उसके नेताओं के कारोबार-व्यापार पर नजर रखते हैं. इसमें ठेका-पट्टा से लेकर रियायत देने तक की गतिविधियां शामिल हैं. ऐसे ही एक कॉमरेड से मंगलवार को आईटीओ पर भेंट हो गई. कुछ दिन पहले तक मेरे ये मित्र दिल्ली में अपनी पार्टी की छात्र इकाई के नेता हुआ करते थे. छात्र राजनीति के दिनों में इस मित्र ने डीयू में पैसे की ताकत पर कांग्रेसी एनएसयूआई और भाजपाई विद्यार्थी परिषद के लहराते झंडे देखे हैं. वैसे तो हमदोनों के पास फटफटिया है लेकिन फिर भी वामपंथी आदतों से मजबूर होने की वजह से जल्दी ही हमारी बातचीत दिल्ली में बसों के संकट पर अटक गई. सर पर मंडरा रहे विधानसभा चुनाव और हाल ही में निगम चुनाव की करारी हार के बावजूद शीला दीक्षित की बेवकूफी ( वैकल्पिक उपायों पर गौर किए बगैर मीडिया के दबाव में ब्लूलाइन बसों को रातोंरात सुधारने के मकसद से उठाए गए कदमों की वजह से ) पर मैं हंस ही रहा था कि मेरे कॉमरेड मित्र ने भाजपा को मामले में लपेट लिया.
कॉमरेड मित्र बता रहे थे कि छोटी-छोटी बात पर सड़क जाम करने, पुतला जलाने और धरना-प्रदर्शन करने वाली भाजपा इस मसले पर दिल्ली की बेबस जनता के दुख में हमकदम होगी, इसमें शक है. मेरा स्वाभाविक सवाल था, क्यों? मित्र ने बताया, दिल्ली की ज्यादातर ब्लूलाइन बसों के मालिक भाजपा के नेता हैं, और कुछ नहीं तो कार्यकर्ता तो हैं ही. भाजपा के नेता अपनी बसों को चलवाने के लिए परेशान है क्योंकि सरकार बार-बार इन बसों को चलता करने की धमकी दे रही है. बस मालिक नेता और उनकी पार्टी सरकार के मिजाज को देखते हुए कोई खतरा उठाने को तैयार नहीं दिख रही है. वे अपेक्षित चुप्पी और औपचारिक बयान के साथ जनता की ओर देख रहे हैं. दिल्ली के बस पीड़ित अभी दुधारी तलवार की तरह हैं. वो अपने कष्ट की सजा संकट पैदा करने वाली सरकार को देंगे या खामोश विपक्ष को, इस नतीजे का इंतजार मुझे जरूर रहेगा. कम से कम यह तो पता चल ही जाएगा कि दिल्ली में सिर्फ सरकार और नेता ही संवेदनहीन हैं या यहां रहने वाले लोग भी भोथरे हो चले हैं.
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